सरकार के अंग : न्यायपालिका का संगठन एवं कार्य

न्यायपालिका क्या है ? (What is Judiciary?)

सरकार के तीन अंग कार्यपालिका, व्यवस्थापिका और न्यायपालिका होते है। स्वतंत्र एवं निष्पक्ष न्यायपालिका एक सभ्य राजनीतिक व्यवस्था का प्रतीक एवं उसकी कसौटी है। कानूनों की व्याख्या करने व उनका उल्लंघन करने वाले व्यक्तियों को दंडित करने की संस्थागत व्यवस्था को न्यायपालिका कहा जाता है।

 न्यायपालिका शासन शक्ति के केंद्रीकरण को रोकती है तथा बहुमत की निरंकुशता के अत्याचारों से जनता की रक्षा करती है। शासन में शक्ति संतुलन व शक्ति विभाजन बनाए रखती है।

 लोकतांत्रिक शासन पद्धति स्वतंत्र और निष्पक्ष न्यायपालिका पर ही टिकी हुई है। न्यायपालिका सरकार का ऐसा अंग है जो विधि का शासन स्थापित करता है। संघात्मक राज्य में न्यायपालिका केंद्रीय तथा प्रांतीय सरकार के मध्य उत्पन्न विवादों को निपटाकर संविधान की रक्षा करती है।

गार्नर, "न्यायपालिका के बिना एक सभ्य राज्य की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। कोई भी समाज विधानमंडल के बिना रह सकता है किंतु इस बात की कल्पना नहीं की जा सकती कि किसी राज्य में न्यायपालिका की कोई व्यवस्था न हो।"

 लार्ड ब्राइस, "न्यायपालिका की क्षमता को सरकार की श्रेष्ठता की कसौटी मानते हैं।"

 लॉक, "जहां कानून समाप्त होता है, वहीं से अत्याचार शुरू होता है।"

• न्यायपालिका का संगठन

न्यायालय के संगठन की एक प्रणाली पिरामिड के समान होती है। उसका संगठन एक ऐसी श्रंखला के रूप में किया जाता है जिसमें एक स्तर के ऊपर उससे उच्च स्तरीय न्यायालय रहता है और सर्वोच्च बिंदु पर सर्वोच्च न्यायालय स्थापित किया जाता है।

भारत में नीचे से ऊपर की और संगठित मुंसिफ न्यायालय, सिविल जज न्यायालय, जिला जज न्यायालय, उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय इस पिरामिड का उदाहरण है।

 साधारणतया छोटे मुकदमे नीचे के न्यायालय में पेश किए जाते हैं और उनके निर्णयों के विरुद्ध ऊपर के न्यायालय में अपील की जाती है। न्यायालयों के संगठन की यह प्रथा है कि दीवानी और आपराधिक न्यायालयों को पृथक-पृथक रूप से संगठित किया जाता है।

न्यायालयों के संगठन का सिद्धांत यह भी है कि न्यायालय जनता के लिए निकटतम स्थान पर सुलभ हो। इसके अनुसार कई राज्यों में चलित न्यायालय संगठित किए जाते हैं।

 कई शासनों में एकीकृत न्यायपालिका पाई जाती है तो अन्य शासकों में दोहरी न्यायपालिका का संगठन किया जाता है। अमेरिका में दोहरी न्यायपालिका की व्यवस्था है। वहां संघीय दायरों के लिए संघीय न्यायपालिका की व्यवस्था है और साथ ही साथ राज्य के दायरों के लिए राज्य की समानांतर न्यायपालिका का प्रावधान है।

 भारत में एकीकृत न्यायपालिका है। फ्रांस में साधारण न्यायालयों के अतिरिक्त प्रशासनिक न्यायालयों का भी संगठन किया जाता है।

अनेक राज्यों में दीवानी और फौजदारी अभियुक्तों के लिए पृथक न्यायालय होते हैं, जबकि कुछ राज्यों में एक ही न्यायालय दोनों प्रकार के अभियोगों का निर्णय करता है। भारत में जिला स्तरीय न्यायालय में दीवानी, फौजदारी मुकदमों की सुनवाई अलग-अलग होती है जबकि उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय में दोनों ही प्रकार के मामले सुने जाते हैं।

 ब्रिटेन में दीवानी न्यायालय अलग है और फौजदारी अलग है। फौजदारी मामलों में जूरी प्रथा का प्रयोग अधिक होता है। प्रत्येक राज्य साधारण न्यायालयों के अतिरिक्त विशिष्ट अभियोगों के लिए कुछ विशिष्ट न्यायालयों की व्यवस्था करता है। यूरोप के कुछ राज्य में प्रशासनिक न्यायालयों की भी अलग स्थापना की गई है।

 प्राथमिक न्यायालयों का अधिकार क्षेत्र स्थानीय विभागों के अनुकूल होता है जबकि उच्च न्यायालय के अधिकार के अंतर्गत विस्तृत क्षेत्र आ जाते हैं। संघीय राज्य में दो प्रकार के न्यायालय होते हैं एक संघीय सरकार द्वारा स्थापित न्यायालय जो राष्ट्रीय कानून को समान रूप से संपूर्ण देश में लागू करते हैं और दूसरा राज्यों के न्यायालय जो अपने अपने क्षेत्र में राज्य के कानूनों के अधीन न्याय की व्यवस्था करते हैं।

 भारत में न्यायपालिका को संगठन का समन्वित रूप प्राप्त है। यहां अमेरिका की भांति संघ एवं राज्यों के सबसे बड़े न्यायालयों को सर्वोच्च न्यायालय कहा जाता है। जिसके अधीन राज्यों के उच्च न्यायालय होते हैं। हर राज्य की न्याय व्यवस्था उस राज्य की उच्च न्यायालय के अधीन होती है।

• न्यायालयों के प्रकार

1. सामान्य न्यायालय - इनमें सामान्य विधि के मामले रखे जाते हैं।

2. विशेष न्यायालय - इन न्यायालयों के अंतर्गत सैनिक न्यायालय, औद्योगिक न्यायालय, श्रम न्यायालय, महाभियोग न्यायालय अथवा धार्मिक न्यायालयों को संगठित किया जाता है।

3. प्रशासनिक न्यायालय - प्रशासनिक न्यायालयों में नागरिक और सरकार के बीच के विवादों को निर्णय के लिए रखा जाता है। प्रशासनिक न्यायालयों में न्याय शीघ्र एवं कम खर्चे में सुलभ होता है।

• न्यायाधीशों की नियुक्तियां

 सामान्यतः न्यायाधीशों की नियुक्ति की तीन पद्धतियां मानी गई है जो इस प्रकार है -

1. कार्यपालिका द्वारा न्यायाधीशों की नियुक्ति

 अधिकांश देशों में न्यायाधीशों की नियुक्ति कार्यपालिका के प्रमुख द्वारा की जाती है। कार्यपालिका प्रमुख जिस व्यक्ति को न्यायिक दृष्टि से उचित समझे उसे न्यायाधीश के पद पर नियुक्त करता है। नियुक्त न्यायधीश शासक दल का अनुगामी होता है। अतः यह स्वतंत्र एवं निष्पक्ष रुप से न्याय नहीं कर सकता।

2. व्यवस्थापिका द्वारा न्यायाधीशों का निर्वाचन

 मुख्य रूप से संयुक्त राज्य अमेरिका में यह पद्धति पहले प्रचलित थी और आज भी वहां चार राज्यों में इसका प्रचलन है, जहां राज्य के विधानमंडल के सदस्यों द्वारा न्यायाधीशों का चुनाव किया जाता है। पूर्व सोवियत संघ और स्विट्जरलैंड में भी न्यायालय के न्यायाधीशों का चुनाव व्यवस्थापिका द्वारा किया जाता है।

3. मतदाताओं द्वारा न्यायाधीशों का निर्वाचन

मॉण्टेस्क्यू के शक्ति पृथक्करण सिद्धांत से प्रभावित होने के कारण सर्वप्रथम फ्रांस में न्यायाधीशों के जनता द्वारा निर्वाचित होने की पद्धति को अपनाया गया और वर्तमान समय में इस पद्धति का प्रचलन आज भी अमेरिका के कुछ राज्यों में, स्विट्जरलैंड के कैण्टनों में तथा जापान में पाया जाता है।

 साधारण जनता को न्यायाधीशों की कानूनी योग्यताओं का ज्ञान नहीं रहता तथा योग्यतम व्यक्ति चुनाव में असफल रहते हैं। उपर्युक्त पद्धतियों में से शक्ति पृथक्करण सिद्धांत के विरुद्ध होने पर भी कार्यपालिका द्वारा नियुक्ति की प्रणाली सर्वाधिक उपयोगी सिद्ध हुई है।

 लास्की ने लिखा है कि, "इस विषय में सभी बातों को देखते हुए न्यायाधीशों की कार्यपालिका द्वारा नियुक्ति के परिणाम सबसे अच्छे रहे हैं। परंतु यह अतिआवश्यक है कि न्यायाधीशों के पदों को राजनीतिक सेवा का फल नहीं बनाया जाना चाहिए।"

• न्यायपालिका के कार्य

1. अभियोगों का निर्णय - विभिन्न व्यक्तियों के विचारों और स्वार्थों का भेद होने के कारण व्यक्तियों के बीच दीवानी, फौजदारी और माल संबंधी विवाद उत्पन्न होते रहते हैं। न्याय विभाग का सर्वप्रथम कार्य विद्यमान कानूनों के आधार पर इन विवादों का निर्णय करना होता है। प्राचीन काल से ही सभी देशों में न्याय विभाग के द्वारा इस प्रकार का कार्य किया जाता है।

2. कानूनों की व्याख्या - कानून की भाषा सदैव स्पष्ट नहीं होती और अनेक बार कानूनों की भाषा के संबंध में अनेक प्रकार के विवाद उत्पन्न हो जाते हैं। इस प्रकार की प्रत्येक परिस्थिति में कानूनों की अधिकारपूर्ण व्याख्या करने का कार्य न्यायपालिका के द्वारा ही किया जाता है। न्यायालय द्वारा की गई इस प्रकार की व्याख्या की स्थिति कानून के समान ही होती है।

3. औचित्य (Equity) के आधार पर कानून निर्माण -

 कानूनों का स्वरूप चाहे कितना ही विस्तृत क्यों ना हो, न्यायालय में अनेक ऐसे विवाद उपस्थित होते हैं जिनका निर्णय वर्तमान कानून द्वारा नहीं किया जा सकता है।

 न्यायालयों के द्वारा इस प्रकार के विवादों का निपटारा विवेक, औचित्य व स्वाभाविक न्याय के सिद्धांत का आश्रय लेकर किया जाता है।

 न्यायाधीश औचित्य, धर्म व सत्य के आधार पर जो निर्णय करते हैं, वह एक परंपरा को जन्म देता है और यदि अन्य न्यायाधीश भी समान परिस्थितियों में किसी प्रकार का निर्णय करें, तो परंपरा के आधार पर एक नवीन कानून का निर्माण हो जाता है, जिसे 'केस लॉ' (Case Law) या न्यायालयों द्वारा निर्मित कानून कहते हैं।

4. परामर्श संबंधी कार्य - अनेक देशों में इस प्रकार की व्यवस्था होती है कि न्यायपालिका निर्णय देने के साथ-साथ कानूनी प्रश्नों पर परामर्श देने का कार्य करती है। यदि व्यवस्थापिका या कार्यपालिका द्वारा इस प्रकार का परामर्श मांगा जाए। उदाहरण के लिए इंग्लैंड में प्रिवी कौंसिल की न्यायिक समिति से सरकार प्रायः वैधानिक और कानूनी प्रश्नों पर परामर्श लेती है।

 कनाडा में सर्वोच्च न्यायालय का एक कार्य यह है कि वह गवर्नर जनरल को कानूनी परामर्श दे। ऑस्ट्रेलिया, पनामा, बुल्गारिया, स्वीडन, भारत आदि देशों में भी इस प्रकार की व्यवस्था है।

5. घोषणात्मक निर्णय प्रदान करना - कभी-कभी जाने या अनजाने में व्यवस्थापिका ऐसे कानूनों का निर्माण कर देती है जो अस्पष्ट या पूर्व निर्धारित कानूनों के विरुद्ध होते हैं। न्यायालयों को ऐसे कानूनों के संबंध में घोषणात्मक निर्णय देने का अधिकार होता है।

6. लेख जारी करना - सामान्य नागरिकों या सरकारी अधिकारियों के द्वारा जब अनुचित या अपने अधिकार क्षेत्र के बाहर कोई कार्य किया जाता है तो न्यायालय उन्हें ऐसा करने से रोकने के लिए विविध प्रकार के लेख जारी करता है। इस प्रकार के लेखों में बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश और प्रतिषेध आदि लेख प्रमुख हैं।

7. न्यायिक पुनरावलोकन का कार्य - न्यायिक पुनरावलोकन का प्रारंभ सर्वप्रथम 1803 में संयुक्त राज्य अमेरिका में हुआ। संयुक्त राज्य अमेरिका में न्यायिक पुनरावलोकन का आधार 'विधि की उचित प्रक्रिया' है अर्थात् कानून निर्माण की क्षमता के अंतर्गत है या नहीं।

 भारत में न्यायिक पुनरावलोकन का आधार 'विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया' है अर्थात् कानून निर्माण की क्षमता के उल्लंघन पर।

 वर्ष 1978 में मेनका गांधी बनाम भारत संघवाद में हुए निर्णय के पश्चात से भारत में न्यायिक पुनरावलोकन की प्रकृति भी अमेरिका के समान हो गई है। अब भारतीय न्यायालय भी 'विधि की उचित प्रक्रिया' का परीक्षण करने लगे हैं।

8. व्यक्ति स्वातंत्र्य एवं अधिकारों की रक्षा

9. संविधान के रक्षण का कार्य

10. संघीय व्यवस्था का संरक्षक

11. मौलिक अधिकारों का संरक्षण

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