अल्पसंख्यकों को प्रतिनिधित्व देने की पद्धतियां

अल्पसंख्यकों का प्रतिनिधित्व (Minority Representation)

सिद्धांत रूप में प्रजातंत्र को समस्त जनता का शासन कहा जाता है, लेकिन व्यवहार में अपनी बहुमत निर्वाचन पद्धति के कारण प्रजातंत्र 'बहुमत का शासन' बनकर रह जाता है। अतः यह आवश्यक हो जाता है कि प्रजातंत्र के अंतर्गत बहुसंख्यकों को ही नहीं वरन अल्पसंख्यकों को भी पर्याप्त प्रतिनिधित्व प्राप्त होना चाहिए, ताकि प्रजातंत्र अपने आदर्श रूप अर्थात यथार्थ में सभी व्यक्तियों का शासन हो सके।
अल्पसंख्यकों को प्रतिनिधित्व देने की पद्धतियां
अल्पसंख्यकों को प्रतिनिधित्व देने की पद्धतियां

अल्पसंख्यकों को प्रतिनिधित्व देने की पद्धतियां

Method for the Representation of Minority
• अनुपातिक प्रतिनिधित्व (Proportional Representation)
 इस पद्धति का प्रतिपादन 18 वीं शताब्दी के एक अंग्रेज विचारक थॉमस हेयर के द्वारा किया गया था। अतः इसे हेयर प्रणाली भी कहा जाता है। इस पद्धति को अपनाने के लिए बहुसदस्यीय निर्वाचन क्षेत्र होने चाहिए और ऐसे निर्वाचन क्षेत्रों में प्रत्येक मतदाता को उतनी ही संख्या में मत देने का अधिकार होता है जितने उम्मीदवार चुने जाते हैं।
 इस प्रकार के चुनाव के अंतर्गत उन उम्मीदवारों को विजय समझा जाता है जिन्हें अपेक्षाकृत बहुमत नहीं वरन मतदाताओं की एक निश्चित संख्या का समर्थन अर्थात चुनाव कोटा (Election Quota) प्राप्त हो जाए।
जे एस मिल ने इस पद्धति को स्वीकार कर 1861 में अपने प्रसिद्ध ग्रंथ 'Representative Government' में इस पर विचार किया।
 अनुपातिक प्रतिनिधित्व को दो रूप में अपनाया जा सकता है -
1. एकल संक्रमणीय मत प्रणाली और
2. सूची प्रणाली।

एकल संक्रमणीय मत प्रणाली (Single Transferable Vote System)

सामान्यतया अनुपातिक प्रतिनिधित्व को एकल संक्रमणीय मत प्रणाली के आधार पर ही अपनाया जाता है। इस प्रणाली के लिए बहुसदस्यीय निर्वाचन क्षेत्र जरूरी है और एक निर्वाचन क्षेत्र में चुने जाने वाले सदस्यों की संख्या चाहे कितनी ही हो प्रत्येक मतदाता को केवल एक ही मत देने का अधिकार होता है। प्रत्येक मतदाता मतपत्र पर दिए गए सब उम्मीदवारों में से जिसे सबसे अधिक उपयुक्त समझता है उसके नाम के आगे पहली पसंद, अपनी पसंद के अनुसार उससे कम उपयुक्त उम्मीदवार के नाम के आगे दूसरी पसंद और इस प्रकार जीतने सदस्य निर्वाचित होते हैं क्रमशः उतनी पसंदें लिख देता है।
 पसंदगियों के उल्लेख की यह व्यवस्था प्रत्येक मतपत्र का उचित उपयोग करने के लिए की जाती है। जब एक उम्मीदवार अपनी लोकप्रियता के कारण निश्चित संख्या (Quota) से अधिक मत प्राप्त कर लेता है तो इन अतिरिक्त मतों को मतदाताओं की दूसरी पसंद के उम्मीदवार को स्थानांतरित कर दिया जाता है।
 इसी प्रकार यदि किसी उम्मीदवार को इतने कम मत प्राप्त हो कि उसके निर्वाचित होने की कोई संभावना न रहे तो मतदाताओं की पसंद के अनुसार इन मतों को दूसरे उम्मीदवारों को स्थानांतरित कर दिया जाता है। मतों के स्थानांतरण की इस व्यवस्था के कारण ही इसे एकल संक्रमणीय मत प्रणाली कहा जाता है।
* निश्चित मत संख्या (Election Quota) - निश्चित संख्या प्रयुक्त किए गए मतों की संख्या में निर्वाचित होने वाले सदस्यों की संख्या में एक जोड़कर उसका भाग देकर तथा परिणाम में एक जोड़कर निकाली जाती है। न्यूनतम कोटा निर्धारण की यह पद्धति ड्रूप द्वारा प्रतिपादित विधि है। सर्वप्रथम जापान में 1900 में प्रयोग में लाई गई। इसका सूत्र निम्न प्रकार है -
 निश्चित मत संख्या = मतों की संख्या / सदस्यों की संख्या +1= +1
 मतगणना - वे उम्मीदवार जो पहली पसंद के मतों की गणना में ही निश्चित मत संख्या प्राप्त कर लेते हैं, पहले ही निर्वाचित घोषित कर दिए जाते हैं। जब पहली पसंद के मतों की गणना के आधार पर निश्चित संख्या में सदस्य निर्वाचित नहीं हो पाते तब मतों का संक्रमण या स्थानांतरण होता है।
 निर्वाचित उम्मीदवारों के निश्चित मत संख्या से अधिक मतों को दूसरी पसंद के आधार पर अन्य उम्मीदवारों को स्थानांतरित कर दिया जाता है। ऐसा करने से जो उम्मीदवार निश्चित संख्या प्राप्त कर लेता है, उसे निर्वाचित घोषित कर दिया जाता है। इस प्रकार मतों का तब तक स्थानांतरण होता रहता है जब तक कि आवश्यक संख्या में सदस्य निश्चित मत संख्या प्राप्त नहीं कर लेते।
 यह प्रणाली जटिल है और इसी कारण इसका प्रयोग बहुत कम देशों में किया जाता है। नार्वे, डेनमार्क, स्वीडन, फिनलैंड आदि देशों में यह प्रणाली प्रचलित है और भारत में इस प्रणाली का प्रयोग राज्यसभा और विधान परिषद, राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति के चुनाव के लिए किया जाता है।

सूची प्रणाली (List System)

 अनुपातिक मत पद्धति का दूसरा रूप सूची प्रणाली है। इस प्रणाली के अंतर्गत भी बहुसदस्यीय निर्वाचन क्षेत्र होते हैं। इस प्रणाली के अंतर्गत जो उम्मीदवार खड़े होते हैं उनकी उनके दलों के अनुसार अलग-अलग सूची बना ली जाती है। प्रत्येक मतदाता चुने जाने वाली संख्या के बराबर मत दे सकता है, पर एक उम्मीदवार को एक ही मत प्राप्त होता है।
 इस प्रणाली के अंतर्गत उम्मीदवारों को पृथक-पृथक प्राप्त मतों की गणना नहीं की जाती, वरन् विभिन्न सूचियों को प्राप्त मतों की गणना की जाती है। इसके पश्चात एकल संक्रमणीय प्रणाली के अनुसार निश्चित संख्या निकाली जाती है तथा उस मत संख्या के अनुसार प्राप्त मतों के आधार पर प्रत्येक सूची के कौन से उम्मीदवार निर्वाचित होने चाहिए यह निकाल लिया जाता है।
 प्रत्येक सूची के कौन से उम्मीदवार निर्वाचित माने जाएं, इसके लिए उन उम्मीदवारों को निर्वाचित माना जाता है, जिन्होंने उस सूची में सबसे अधिक मत प्राप्त किए हो। इस योजना से सभी दलों को उनकी शक्ति के अनुपात में प्रतिनिधित्व प्राप्त हो जाता है।
सूची प्रणाली के दो रूप हैं - 1. सर्वोच्च औसत द्वारा अनुपातिक प्रतिनिधित्व (प्रवर्तक - डी हांट । इसे डी हांट का नियम भी कहा जाता है।)
2. महतम शेष
* अनुपातिक प्रतिनिधित्व के गुण -
१. अल्पसंख्यकों को उचित प्रतिनिधित्व - इस पद्धति के अंतर्गत लोगों को उचित प्रतिनिधित्व प्राप्त हो जाता है। जब व्यवस्थापिका में प्रत्येक वर्ग को उचित प्रतिनिधित्व प्राप्त हो जाता है और देश के प्रत्येक वर्ग को अपने विचार व्यक्त करने का अवसर प्राप्त हो जाता है तो प्रजातंत्र अपने पूर्ण और वास्तविक रूप में प्रकट होता है। इससे अल्पसंख्यकों में सुरक्षा की भावना भी उत्पन्न होती है।
२. व्यवस्थापिकाएं पूर्ण प्रतिनिधि होती है - अनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति ने अल्पसंख्यकों के प्रतिनिधित्व की जटिल समस्या का सबसे सरल हल प्रस्तुत किया है। जब प्रत्येक वर्ग को अपनी संख्यात्मक शक्ति के आधार पर प्रतिनिधित्व प्राप्त हो जाता है तो व्यवस्थापिकाएं पूर्ण प्रतिनिधि हो जाती हैं।
३. नागरिक चेतना का विकास - सभी वर्गों को व्यवस्थापिका में उचित प्रतिनिधित्व प्राप्त हो जाने से नागरिक चेतना का विकास होता है और वे सार्वजनिक क्षेत्र के प्रति उदासीन नहीं रहते।
४. चुनाव जुआ नहीं होते - साधारण बहुमत पद्धति के अंतर्गत चुनाव परिणाम चुनाव के समय विशेष परिस्थितियों पर ही निर्भर करते हैं और इसी कारण चुनाव को जुआ का जाता है। लेकिन आनुपातिक प्रतिनिधित्व में प्रत्येक वर्ग अपनी संख्या के अनुपात के आधार पर प्रतिनिधित्व प्राप्त कर सकता है और इस प्रकार चुनाव जुआ नहीं रहते हैं।
इसके अतिरिक्त इसे न्याय पर आधारित और सर्वथा प्रजातंत्रवादी पद्धति कहा जा सकता है।
* अनुपातिक प्रतिनिधित्व के दोष
 प्रो लास्की आनुपातिक प्रतिनिधित्व की पद्धति के प्रमुख आलोचक रहे हैं। इस पद्धति के निम्न दोष बताए जा सकते हैं -
१. अनेक राजनीतिक दलों और गुटों का जन्म
२. वर्गीय हितों को प्रोत्साहन - सिजविक के शब्दों में "वर्गीय प्रतिनिधित्व आवश्यक रूप से दूषित वर्गीय व्यवस्थापन को प्रोत्साहित करता है।"
३. मिले-जुले मंत्रिमंडल का निर्माण और परिणामस्वरूप अस्थायी सरकारों का जन्म
४. निर्वाचकों और प्रतिनिधियों में संपर्क नहीं
५. अत्यधिक जटिल पद्धति
६. उपचुनावों के लिए व्यवस्था नहीं

एकत्रित / संभूत मतदान योजना (Cumulative Vote System)

 इस निर्वाचन पद्धति के लिए भी बहुसदस्यीय निर्वाचन क्षेत्र आवश्यक है। प्रत्येक मतदाता को अपने मत देने का अधिकार होता है, जितने सदस्य उस क्षेत्र से चुने जाने हैं। मतदाता को यह भी अधिकार होता है कि वह चाहे तो अपने सभी मतों को किसी एक उम्मीदवार को प्रदान करें या उन्हें विभक्त कर दें।
 जैसे दिल्ली क्षेत्र से 6 सदस्य चुने जाने हो, तो प्रत्येक मतदाता अपने 6 मत किसी एक सदस्य को दे सकता है या अलग-अलग उम्मीदवारों को दे सकता है।
 साधारणतया अल्पसंख्यकों में बहुसंख्यकों की अपेक्षा वर्गीय भावना अधिक दृढ़ होती है। इसलिए यह पद्धति अल्पमतों को उचित प्रतिनिधित्व प्रदान करने में सहायक होती है, किंतु यह प्रणाली कुछ जटिल है और इसमें मतगणना में कठिनाई होती है। यह योजना 1953 में प्रकाश में आयी।

सीमित मतदान योजना (Limited Vote System)

 सीमित मतदान योजना एकत्रित मतदान योजना के विपरीत है। इस पद्धति में भी ऐसा निर्वाचन क्षेत्र होना आवश्यक होता है जिससे 3 या 3 से अधिक सदस्य चुने जाने हो। इस प्रकार की व्यवस्था होती है कि निर्वाचन क्षेत्र में जितने सदस्य चुने जाने हैं प्रत्येक मतदाता को उससे कम मत देने का अधिकार होता है।
 उदाहरण के लिए अहमदाबाद शहर से 6 प्रतिनिधि चुने जाने हो तो प्रत्येक मतदाता को अधिक से अधिक 5 मत देने का अधिकार होता है। इसके अतिरिक्त मतदाता एक ही उम्मीदवार को एक से अधिक मत नहीं दे सकता। वस्तुत: इस पद्धति से केवल बड़े अल्पमत वर्गों को ही प्रतिनिधित्व मिल पाता है।
इस योजना को 1831 में प्रेड ने प्रस्तावित किया।

द्वितीय मतपत्र योजना (Second Ballot System)

 प्रतिनिधित्व को व्यापक न्यायोचित बनाने की एक अन्य प्रणाली द्वितीय मतपत्र योजना है। इसके अंतर्गत जब एक ही स्थान के लिए 2 से अधिक उम्मीदवार खड़े हो और सर्वाधिक मत प्राप्त करने वाले उम्मीदवार को कुल मतों का बहुमत प्राप्त न हो तो पहले चुनाव के प्रथम 2 उम्मीदवारों के बीच दोबारा मतदान होता है।
 इस दूसरे मतदान में प्रथम दो के अतिरिक्त अन्य उम्मीदवारों को चुनाव से बाहर कर दिया जाता है। द्वितीय मतदान में निरपेक्ष बहुमत प्राप्त करने वाले उम्मीदवार को निर्वाचित घोषित किया जाता है।
 द्वितीय मतदान में उस उम्मीदवार को भी विजय प्राप्त हो सकती है जिसे प्रथम मतदान में द्वितीय स्थान प्राप्त था। द्वितीय निर्वाचन की आवश्यकता होने के कारण व्यवहार में यह प्रणाली कठिन है। वर्तमान समय में फ्रांस की व्यवस्थापिका के चुनाव में इस पद्धति को अपनाया जाता है।

पृथक निर्वाचन प्रणाली (Separate or Communal Electorate System)

 इस प्रणाली में धर्म या संप्रदाय के आधार पर निर्वाचन क्षेत्र बनाए जाते हैं‌। भारत में ब्रिटिश शासन ने 1909 के अधिनियम द्वारा यह प्रणाली प्रचलित की और उसके आधार पर मुसलमानों को अपने प्रतिनिधि चुनने का अधिकार दिया गया।
 इस प्रणाली के अंतर्गत प्रत्येक संप्रदाय के लिए स्थान सुरक्षित कर दिए जाते थे और एक संप्रदाय के लिए आरक्षित स्थानों पर उस संप्रदाय के व्यक्ति ही उम्मीदवार हो सकते थे तथा उस संप्रदाय के व्यक्तियों द्वारा ही उनका निर्वाचन किया जाता था।
 इस पद्धति को अपनाने पर अल्पसंख्यक सांप्रदायिक वर्गों को प्रतिनिधित्व तो अवश्य मिल जाता है परंतु इसमें कई गंभीर दोष है। इससे राष्ट्रीय भावनाओं पर कुठाराघात होता है तथा धार्मिक और सांप्रदायिक विद्वेष प्रबल हो जाते हैं।
 ब्रिटिश शासन द्वारा 'फूट डालो और शासन करो' की नीति के अनुसार इसे अपनाया गया था और 1947 में भारत का विभाजन इस पद्धति का ही परिणाम था। यह पद्धति अत्यधिक दोषपूर्ण है और आज की परिस्थितियों में इसे अपनाने की बात नहीं सोची जा सकती। वस्तुतः राजनीतिक उपयोगिता की दृष्टि से इस पद्धति का कोई मूल्य नहीं है

आरक्षित स्थान युक्त संयुक्त निर्वाचन प्रणाली (Joint Electorate System with Reservation of Seats)

 इस प्रणाली के अंतर्गत निश्चित संख्या में कुछ निर्वाचन क्षेत्र अल्पसंख्यक वर्गों के लिए निर्धारित कर दिए जाते हैं। इन निर्वाचन क्षेत्रों में उस वर्ग विशेष के प्रतिनिधि चुनाव लड़ सकते हैं, लेकिन ये प्रतिनिधि उस वर्ग विशेष के मतदाताओं द्वारा नहीं उस क्षेत्र विशेष के सभी मतदाताओं द्वारा चुने जाते हैं।
 इस प्रणाली की श्रेष्ठता यह है कि एक ओर तो इसमें अल्पसंख्यक वर्गों को उचित प्रतिनिधित्व प्राप्त हो जाता है तथा दूसरी और अल्पसंख्यक वर्गों से ऐसे प्रतिनिधि चुने जाते हैं, जिन्हें सभी वर्गों का समर्थन प्राप्त हो।
यह भी पढ़ें - जातिवाद और भारतीय राजनीति में जाति की भूमिका
 इससे अल्पसंख्यक वर्गों में अलगाव की प्रवृत्ति उत्पन्न नहीं हो पाती और ये प्रतिनिधि न केवल अपने वर्ग विशेष वरन् सार्वजनिक हित के लिए कार्य करते हैं। भारत में अनुसूचित जातियों और जनजाति क्षेत्रों के चुनाव के लिए इस पद्धति को अपनाया गया है।

टिप्पणी पोस्ट करें

0 टिप्पणियां