समाजवाद के प्रकार - श्रेणी समाजवाद और श्रमिक संघवाद

श्रेणी समाजवाद ब्रिटेन की देन है। समष्टिवाद, श्रम संघवाद और फेबियनवाद से अंग्रेज संतुष्ट नहीं हुए। श्रम संघवाद उन्हें अत्यधिक क्रांतिकारी और अराजकतापूर्ण लगा। यह आकस्मिक परिवर्तन तथा राज्यविहीन समाज की धारणा ब्रिटेनवासियों के विपरीत थी। फेबियनवाद भी अंग्रेजों को आकर्षित करने में असफल रहा। इसी मध्य ब्रिटेनवासियों ने एक नई विचारधारा का सृजन किया जिसे श्रेणी समाजवाद कहते हैं।
समाजवाद के प्रकार, श्रेणी समाजवाद और श्रमिक संघवाद
श्रेणी समाजवाद और श्रमिक संघवाद

 श्रेणी समाजवाद के प्रमुख विचारक जी डी एच कॉल, ए आर ऑरेंज, आर एच को, एस जी हॉब्सन तथा ए जे पेन्टी है। इन सभी विचारकों का विश्वास था कि धीमी गति से किए जाने वाले सुधारों से पूंजीवाद को समाजवाद में बदला जा सकता है।
 ए जे पेन्टी ने एक ऐसी व्यवस्था का विचार प्रकट किया जिसमें श्रमिकों के विभिन्न गिल्ड्स (श्रेणियां) बनाई जाएं, जिन्हें स्वायत्तता प्रदान कर सरकार की शक्ति को विकेंद्रित कर दिया जाए और श्रमिकों को ही उत्पादन की प्रकृति व मात्रा का निर्णय करने का अधिकार मिलना चाहिए।
 श्रेणी समाजवाद को विकसित करने में जी डी एच कॉल एक अन्य प्रमुख प्रवक्ता सिद्ध हुए। इसने उद्योगों के राष्ट्रीयकरण तथा उद्योगों पर राज्य के नियंत्रण पर बल दिया। मजदूरी प्रथा के अंत की बात की।
 इसके बाद सेमुअल, जॉर्ज हॉब्सन, रस्किन, कार्लाइल, विलियम मॉरिस आदि ने श्रेणी समाजवाद को विकसित करने में सहयोग दिया। स्थानीय, प्रादेशिक व राष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न उद्योगों और व्यवसायों के प्रतिनिधि गिल्ड संगठनों द्वारा ही सामाजिक व आर्थिक क्षेत्र में समाजवादी समाज की स्थापना की जाए। यही श्रेणी (गिल्ड) समाजवाद है।
 ऐसे समाजवादी समाज की व्यवस्था के माध्यम से ही पूंजीवाद का उन्मूलन होगा और उत्पादको व उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा हो पाएगी।

श्रेणी समाजवाद का अर्थ और लक्षण

Meaning and Characteristics of Guild Socialism
 श्रेणी समाजवाद वह समाजवाद है जो उत्पादन एवं आर्थिक व्यवस्था में श्रेणियों की सार्थकता में विश्वास प्रकट करता है।
 जी डी एच कॉल के अनुसार, "श्रेणी समाजवाद का आधार उद्योगों के नियंत्रण में उत्पादकों एवं राज्य के बीच सहयोग का विचार है।"
 कोकर के अनुसार, "श्रेणी समाजवाद विशिष्ट श्रमिक हितों के संघवादी विचार को सामान्य अथवा सार्वजनिक हितों के राजनीतिक विचार के साथ मेल करने का एक प्रयास है।"
 श्रेणी समाजवादी पूंजीवाद के विरुद्ध है क्योंकि यह मजदूरों और उनके अधीन अत्यंत हीन और बुरी स्थिति में रहने को बाध्य करते हैं। वे एक ऐसे नवीन समाज का निर्माण करना चाहते हैं जो श्रेणी व्यवस्था पर आधारित हो और सभी उद्योगों में स्थापित इन श्रेणियों में ही अंतिम सता निहित हो। उनका मानना है कि उद्योगों और मिल के स्वामियों को श्रमिक वर्ग की कार्य-स्थितियों को नियंत्रित करने का कोई अधिकार नहीं है।

श्रेणी समाजवाद की प्रमुख विशेषताएं

 Salient features of Guild Socialism
1. श्रेणियों को अधिक महत्व देना
2. राज्य सत्ता का कमजोर होना
3. श्रम संघवादी तत्वों का होना
4. समष्टिवादी तत्वों का पाया जाना
5. श्रेणी समाजवाद में मत विभिनता का पाया जाना
6. प्रजातंत्र में अविश्वास
7. संवैधानिक साधनों द्वारा परिवर्तन

श्रमिक संघवाद (Syndicalism)

 श्रमिक संघवाद का जन्म फ्रांस में 18 वीं शताब्दी में हुआ। यह मजदूर आंदोलन के परिणामस्वरुप हुआ। इसकी उत्पत्ति का आधार व्यापारिक संगठनों की स्थापना थी। श्रमिक संघवाद का विकास अमेरिका, ब्रिटेन, इटली, स्पेन आदि देशों में भी हुआ। श्रमिक संघवाद का प्रवर्तक एच जी सोरेल को माना जाता है।

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श्रमिक संघवाद का अर्थ एवं परिभाषाएं

Meaning and definitions of Syndicalism
 श्रमिक संघवाद का अंग्रेजी रूपांतरण 'सिंडीकेलिज्म' है। जो फ्रेंच शब्द 'सिंडिकेट' से निकला है। सिंडिकेट का अर्थ है श्रमसंघ अथवा ट्रेड यूनियन। फ्रांस में उन श्रमिकों के संगठन को सिंडिकेट कहा गया जो एक ही प्रकार का उद्यम करते थे तथा उत्पादन के साधनों पर स्वयं नियंत्रण करना चाहते थे। श्रम संघवाद के अर्थ एवं परिभाषा के प्रसंग में सिंडिकेट शब्द श्रम संघ का अर्थ बोधक है।
 परंतु फ्रेंच भाषा में सिंडिकेट राजनीतिक दलों तथा अन्य राजनीतिक समूह से भिन्न अर्थ देता है राजनीतिक दलों के सदस्य विभिन्न हितों के व्यक्ति होते हैं। कोई भी ऐसा व्यक्ति दल की सदस्यता ले सकता है जो सिद्धांतों पर सहमत हो जबकि सिंडिकेट के सभी सदस्यों के हितों व व्यापार समान होते हैं। इनकी स्थिति में भी समानता पाई जाती है। राजनीतिक दलों की स्थिति सिंडिकेट से भिन्न होती है।
 फ्रांस में जितने श्रम संघों का जन्म हुआ उनमें उग्रपंथियों और नरमपंथियों का विकास हुआ। जिन्हें क्रांतिकारी श्रम संघवाद या सुधारवादी श्रम संघवाद कहते हैं। श्रम संघवाद का अर्थ क्रांतिकारी श्रम संघवाद से है।
सी ई एम जोड़ के अनुसार, "श्रम संघवाद सामाजिक सिद्धांत का वह रूप है जो श्रम संघों को नए समाज का आधार तथा उस समाज को प्राप्त करने का साधन मानता है।"
 इस प्रकार श्रम संघवाद से क्रांतिकारी श्रम संघवाद का ही बोध होता है। वर्ग संघर्ष का सिद्धांत इसका मुख्य प्रेरणा स्रोत है और इस दृष्टि से इसे मार्क्सवाद की पुनरावृति कह सकते हैं।

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श्रम संघवाद के सिद्धांत

Principles of Syndicalism
 यह विचारधारा सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक क्षेत्रों में मजदूरों का पक्ष लेकर चलती है और उनके हाथों में संपूर्ण सत्ता सौंपकर उन्हें सब का असली निर्माता और सर्वे सर्वा बनाना चाहती है। यह नैतिक आदर्शों में विश्वास नहीं करते बल्कि अन्यायपूर्ण पूंजीवादी व्यवस्था तथा उसके साथ-साथ राज्य दोनों का विनाश करके उनके स्थान पर मजदूरों का अधिपत्य स्थापित करना चाहता है।
 यह एक ऐसा आदर्श समाज होगा जिसमें श्रमिक स्वयं काम करेगा किसी स्वामी के डर से नहीं। समाज उपभोक्ताओं का संगठन होगा। श्रम संघवाद के निम्न सिद्धांत हैं -
1. श्रम संघवाद राज्य के पक्ष में नहीं है।
2. इसमें संसदीय प्रणाली के प्रति अविश्वास होता है।
3. यह राजनीतिक दलों के पक्ष में नहीं है इसमें राष्ट्रीयता का विरोध किया जाता है।
4. यह समाज के संपूर्ण आर्थिक जीवन पर संगठित श्रम संघों के अधिकार के पक्ष में है।
5. यह जब तक राज्य का अस्तित्व है तब तक सेवाओं से लाभ उठाने के पक्ष में है।
6. इसमें राष्ट्रीयता का विरोध किया जाता है।
7. यह युद्ध व सेना के पक्ष में नहीं है।
8. इसका सर्वहारा वर्ग की तानाशाही और राजकीय समाजवाद में विश्वास नहीं है।

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