व्यवस्थापिका के कार्य | व्यवस्थापिकाओं के पतन के कारण

व्यवस्थापिका के कार्य बहुत कुछ सीमा तक शासन पद्धति के रूप पर निर्भर करते हैं। एकतंत्र, राजतंत्र या अधिनायकतंत्र में व्यवस्थापिका (Legislature) के कोई विशेष कार्य नहीं होते, किंतु लोकतंत्रात्मक राज्यों में व्यवस्थापिका की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण होती है। ब्रिटेन की राजव्यवस्था में तो व्यवस्थापिका की सर्वोच्चता का सिद्धांत स्वीकार किया गया है।
 लोकतंत्रात्मक राज्यों में भी संसदात्मक एवं अध्यक्षात्मक शासन व्यवस्था में व्यवस्थापिका की स्थिति भिन्न-भिन्न होती है। संसदात्मक शासन में व्यवस्थापिका, कार्यपालिका पर नियंत्रण रखती है जैसा कि अध्यक्षात्मक शासन में संभव नहीं है। सामान्य रूप से लोकतंत्र राज्यों में व्यवस्थापिका के कार्य निम्न हैं –

व्यवस्थापिका के कार्य, व्यवस्थापिकाओं के पतन के कारण
व्यवस्थापिका के कार्य, व्यवस्थापिका का पतन

व्यवस्थापिका के कार्य (functions of Legislature)

1. कानून निर्माण संबंधी कार्य
 व्यवस्थापिका का सबसे महत्वपूर्ण और मुख्य कार्य कानूनों का निर्माण करना होता है। यह विभाग विधेयकों का प्रारूप तैयार करता है, उन पर वाद-विवाद करता है और फिर इसे स्वीकार कर कानून का रूप प्रदान करता है। व्यवस्थापिका पुराने कानूनों में संशोधन, परिवर्तन व उन्हें समाप्त करने का कार्य भी करती है।
2. संविधान संशोधन का कार्य
 सभी देशों में व्यवस्थापिका संविधान में संशोधन का कार्य करती है। यद्यपि विभिन्न देशों में व्यवस्थापिका के द्वारा यह कार्य भिन्न-भिन्न प्रक्रियाओं के आधार पर किया जाता है।
 उदाहरण के लिए इंग्लैंड में पार्लियामेंट अपने सामान्य बहुमत से ही संविधान में किसी भी प्रकार का संशोधन कर सकती है, लेकिन संयुक्त राज्य अमेरिका, भारत आदि देशों में संविधान में संशोधन की पद्धति सामान्य कानून निर्माण की पद्धति से भिन्न है।
3. विमर्शात्मक कार्य
 व्यवस्थापिका का एक प्रमुख कार्य विचार विमर्श करना होता है। व्यवस्थापिका के लिए जो पार्लियामेंट (Parliament) शब्द का प्रयोग किया जाता है वह फ्रांसीसी शब्द पार्लमेंट से लिया गया है। जिसका अर्थ विचार करने के निमित्त सभा है।
 व्यवस्थापिका में स्वार्थों, दृष्टिकोण तथा समुदाय के प्रतिनिधियों के बीच विस्तृत एवं स्वतंत्र विचार विनिमय होता है। विचारों के आदान-प्रदान का संचालन शांतिपूर्ण और व्यवस्थित तरीके से करने के लिए व्यवस्थापिका कुछ निश्चित नियमों के आधार पर अपना कार्य करती है।
4. आर्थिक कार्य
 वर्तमान समय में व्यवस्थापिका कानून निर्माण के साथ-साथ राष्ट्रीय वित्त पर नियंत्रण करने का कार्य भी करती है। आर्थिक कार्यों के अंतर्गत व्यवस्थापिका यह निश्चित करती है कि किन साधनों से धन प्राप्त किया जाए। वह राष्ट्रीय बजट पारित करती है। व्यवस्थापिका की स्वीकृति के बिना आय व्यय से संबंधित कोई कार्य नहीं किया जा सकता है।
5. प्रशासन संबंधी कार्य
 यद्यपि व्यवस्थापिका सीधे तौर पर प्रशासनिक कार्यों में भाग नहीं लेती, लेकिन प्रशासन पर नियंत्रण अवश्य ही रखती है। व्यवस्थापिका द्वारा प्रशासन संबंधी यह कार्य संसदात्मक तथा अध्यक्षात्मक शासन पद्धति में भिन्न-भिन्न रूपों में किया जाता है।
 संसदात्मक शासन में व्यवस्थापिका प्रश्नों, स्थगन प्रस्तावों, निन्दा प्रस्तावों और अविश्वास प्रस्ताव के माध्यम से कार्यपालिका पर प्रत्यक्ष नियंत्रण रखती है और कार्यपालिका का अस्तित्व व्यवस्थापिका की इच्छा पर निर्भर करता है। अध्यक्षात्मक शासन में व्यवस्थापिका, कार्यपालिका पर अप्रत्यक्ष रूप से नियंत्रण रखती है।
 अमेरिका की कार्यपालिका जो महत्वपूर्ण नियुक्तियां और संधियां करती है, उनके संबंध में सीनेट की स्वीकृति प्राप्त करना आवश्यक है।
6. न्याय संबंधी कार्य
अनेक देशों में व्यवस्थापिका न्याय संबंधी कार्य भी करती हैं। फ्रांस की काउंसिल ऑफ रिपब्लिक, अमेरिका की कांग्रेस और भारत की संसद को कार्यपालिका पदाधिकारियों पर अभियोग लगाने और उनके निर्णय का अधिकार प्राप्त है। इंग्लैंड में तो व्यवस्थापिका का उच्च सदन हाउस ऑफ लार्ड्स अपील के उच्चतम न्यायालय के रूप में भी कार्य करता है। स्विट्जरलैंड की राष्ट्रीय सभा को संविधान सभा की व्याख्या का अधिकार प्राप्त है।
7. निर्वाचन संबंधी कार्य
 अधिकांश देशों में व्यवस्थापिका निर्वाचन संबंधी कार्य करती हैं। उदाहरण के लिए, फ्रांस के दोनों सदन मिलकर वहां के राष्ट्रपति का निर्वाचन करते हैं। स्विट्जरलैंड की व्यवस्थापिका न्यायाधीशों और मंत्रिपरिषद के सदस्यों का चुनाव करती है। भारत में संघीय संसद तथा विधानसभा के निर्वाचित सदस्यों द्वारा राष्ट्रपति का निर्वाचन किया जाता है। जापान में डायट प्रधानमंत्री का चयन करती हैं।
8. समितियों और आयोगों की नियुक्ति
विधानमंडल समय-समय पर विशेष कार्यों की जांच करने के लिए समितियों और आयोगों की नियुक्ति का कार्य करता है और इनके माध्यम से शासन के कार्यों की छानबीन की जाती है। इसके अलावा अमेरिका, इंग्लैंड, भारत आदि सभी देशों में सरकारी निगमों की रचना की गई है। इन निगमों की गतिविधियों और कार्यों पर संसद का पूरा नियंत्रण रहता है।
9. जन भावनाओं की अभिव्यक्ति
 लोकतंत्र में व्यवस्थापिका एक ऐसा स्थान है जहां पर जनता के प्रतिनिधि सरकार का ध्यान जनता के कष्टों के प्रति आकर्षित करते हैं और शासन को जनहित कार्य करने के लिए प्रेरित करते हैं। इस प्रकार व्यवस्थापिका को जनता का रंगमंच कहा जाता है।
यह भी पढ़ेंव्यवस्थापिका का संगठन

व्यवस्थापिकाओं का पतन

The Decline of Legislatures
 लॉर्ड ब्राइस ने अपनी पुस्तक मॉडर्न डेमोक्रेसीज (Modern democracies) में व्यवस्थापिका के पतन (Decline of Legislatures) की सर्वप्रथम चर्चा की है। ब्राइस ने अपनी पुस्तक में एक अध्याय का शीर्षक ‘व्यवस्थापिका का पतन’ रखा है।

* व्यवस्थापिकाओं के पतन के कारण

Due to the Decline of Legislatures
1. कार्यपालिका के कार्यों में अभूतपूर्व वृद्धि – कल्याणकारी राज्य की अवधारणा ने कार्यपालिका के कार्यों में अभूतपूर्व वृद्धि की है। कानून निर्माण, आर्थिक नियोजन व योजनाओं का संचालन कार्यपालिका का प्रमुख दायित्व बन गया है।
2. प्रदत्त व्यवस्थापन की प्रथा – कार्य का बोझ बढ़ने तथा व्यवस्थापिका की व्यस्तता के कारण व्वस्थापिका अपने कार्य, कार्यपालिका को सौंप देती है। इसे प्रदत व्यवस्थापन (Delegated Legislation) कहा जाता है।
लार्ड हेवर्ट ने प्रदत्त व्यवस्थापन को ‘न्यू डेस्पोटिज्म’ कहकर पुकारा है।
3. विशेषज्ञों की परिषदों व समितियों का विकास।
4. संचार साधनों का विकास।
5. दलीय राजनीति।
6. सेवाओं पर कार्यपालिका का नियंत्रण।
7. विदेश संबंधों की प्रधानता।
8. विशाल सरकारों (Big Government) में वृद्धि।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *