निकोलो मैकियावेली (Niccolo Machiavelli) - अपने युग का शिशु

निकोलो मैकियावेली (Niccolo Machiavelli) – अपने युग का शिशु

निकोलो मैकियावेली का जीवन परिचय

Machiavelli’s life introduction
निकोलो मैकियावेली का जन्म इटली के फ्लोरेंस नामक नगर में 1469 ई. में हुआ। फ्लोरेंस उस समय नवजागरण का मूल केंद्र था। मैकियावेली को अपने युग का शिशु कहा जाता है। आरंभिक शिक्षा दीक्षा के उपरांत 25 वर्ष की अवस्था में मैकियावेली का राजनीतिक जीवन प्रारंभ हुआ। अपनी प्रतिभा के कारण वह फ्लोरेंस के गणतंत्र राज्य में एक उच्च राजनीतिक पद पर आसीन हुआ। यह शासकीय पद युद्ध तथा आंतरिक मामलों से संबंधित था। 1512 तक मैकियावेली इस पद पर बना रहा।

निकोलो मैकियावेली, Niccolo Machiavelli, अपने युग का शिशु
निकोलो मैकियावेली [Niccolo Machiavelli]

इस बीच इसे इटली के विभिन्न राज्यों के साथ कूटनीतिक संपर्क स्थापित करने तथा यूरोप के अन्य राज्यों के साथ कूटनीतिक पत्राचार करने तथा उन देशों का भ्रमण करने का अवसर मिला जिसके कारण उसे सक्रिय राजनीति का पर्याप्त व्यवहारिक अनुभव प्राप्त हो गया। वह विभिन्न यूरोपियन देशों में 23 बार दूत नियुक्त हुए।
 1512 में फ्लोरेंस में राज्यक्रांति हो जाने के फलस्वरूप पुनः मैडिसी शासकों को सत्तारूढ़ होने का अवसर मिला। मैकियावेली पर इन शासकों के द्वारा षड्यंत्र का आरोप लगाया गया अतः उसे न केवल अपने पद से ही अलग कर दिया, अपितु देश निष्कासन का दंड भी भोगना पड़ा। उसके ऊपर षड्यंत्र का अभियोग चलाया गया तथा एक वर्ष का कारावास भोगने के बाद मुक्त कर दिया गया। यहां से उसके राजनीतिक जीवन का अंत हो गया।
 वह देहात के एक फार्म में रहने लगा। वहीं उसने अपने राजनीतिक अनुभवों के आधार पर अपनी सुप्रसिद्ध रचनाएं ‘The Prince’ और ‘Discourses’ लिखी। प्रिंस रचना 1513 में पूर्ण कर ली गई तथा इसका प्रकाशन 1532 में हुआ। यह रचना मैडिसी शासक लोरेंजो को संबोधित करके लिखी गई थी। संभवत मैकियावेली का उद्देश्य शासक से कोई उच्च राजनीतिक पद प्राप्त करना था जिसमें वह असफल रहा। 1527 ईस्वी में 58 वर्ष की आयु में इस महान मध्ययुग के अंतिम राजनीतिक विचारक की मृत्यु हो गई।
निकोलो मैकियावेली इटली के शासक ड्यूक सीजर बेर्जिया से इतना अधिक प्रभावित हुआ कि उसे उसने अपना आदर्श महापुरुष मान लिया और अपनी महान रचना द प्रिंस के नायक के रूप में चित्रित किया।
मैक्यावली को सबसे पहला आधुनिक राजनीतिक चिंतक कहकर मैक्सी ने पुकारा है और डनिंग के अनुसार, ‘प्रिंस सबसे पहली महान रचना है जिसमें मध्ययुगीन चिंतन प्रणाली का परित्याग किया गया है।” गैटेल के शब्दों में, “मैकियावेली आधुनिक राज दर्शन का जनक था।” और सेबाइन के अनुसार, “संपूर्ण पुनरुत्थान मैकियावेली में आ गया है।” जॉन्स लिखते हैं, “मैकियावेली अपने समय का एक उत्कृष्टतम निचोड़ है।”
 वस्तुतः मैकियावेली के राजनीतिक चिंतन को आधुनिक युग के प्रथम राजनीतिक होने का गौरव प्राप्त है, क्योंकि उसके विचार मध्ययुगीन परंपराओं से सर्वथा भिन्न है। मध्य युग के समस्त राजनीतिक विचारों का चिंतन चर्च तथा राज्य के पारस्परिक संबंधों के निर्धारण की समस्या पर ही केंद्रित था। इसके विपरीत मध्ययुगीन की लीक से हटकर मैकियावेली राजनीति में धर्म और नैतिकतावाद का अनुसरण करने के बजाय शुद्ध व्यवहारवाद का अनुसरण करता है।
 उसने राजनीतिक दर्शन को मध्य युग के पांडित्यपूर्ण अस्पष्टवाद से बचाते हुए ऐतिहासिक और अनुभवसिद्ध तत्वों के आधार पर राजनीति दर्शन में एक नवीन विचारधारा का सूत्रपात किया।

मैकियावेली को प्रभावित करने वाले विचारक

Thinkers who influenced maciavelli
 मैकियावेली को प्रभावित करने वाले विचारक अरस्तु, प्लेटो, लिओ नार्दो दा विंची, फ्रांसिस्को, पेट्रोर्का, दांते एलीगियरी, डेसीडेरियस इरास्मस, लिवि टायमस, सिसरो, थ्यूसीदाइडीज, प्लूटार्क, पॉलीबियस, जेनोफोन, टैसिटस आदि है।

मैकियावेली की पुस्तक

Machiavelli’s book
1. The Price
2. The Discourses on Livy
3. History of Florence
4. The Art of War
5. Novelle Bafagor Arcidiavolo
6. life of castruccio castracani
7. The Essential Writing of Machiavelli
8. The Mandrake (नाटक)


प्रिंस में मैकियावेली उन बातों का विवेचन करता है जो राज्य का निर्माण हो जाने पर उसकी शासन व्यवस्था के लिए आवश्यक है। डिसकोर्सेज में वह उन साधनों का विवेचन करता है जो राजनीतिक समाज के अंतर्गत जनता को एक साथ संगठित करने में सहायक होते हैं।Discourses के विचार मैक्यावली के राजनीतिक दर्शन को व्यक्त करते हैं, जबकि Prince में शासन संबंधी उन व्यवहारों का विवेचन किया गया है जिसका अनुगमन करके शासक राज्य को सुदृढ़ शासन प्रदान कर सकता है।
 सामान्यतया प्रिंस के विचार आपातकाल में राजनीतिक व्यवस्था के सिद्धांतों तथा व्यवहारों का विवेचन करते हैं और डिसकोर्सेज गणतंत्र के विस्तार की रूपरेखा प्रस्तुत करता है। वैसे डिसकोर्सेज की गणतंत्र व्यवस्था राजतंत्र ही है। दोनों में लेखक का उद्देश्य राज्य की सुरक्षा तथा विस्तार है। इस हेतु वह दोनों ग्रंथों में शासन कला तथा युद्ध कला के बारे में लिखता है।

मैकियावेली का राजनीतिक दर्शन

Machiavelli’s political philosophy
मानव स्वभाव – मैकियावेली की राज्य और शासन संबंधी विचार मानव स्वभाव की धारणा पर आधारित है। वे प्रिंस के 17 वें अध्याय में वर्णित करते हैं कि मनुष्य स्वभाव से स्वार्थी, लोभी, दानव प्रवृत्ति वाला और दुष्ट होता है। उसमें अच्छाई नहीं होती। मनुष्य की क्रियाओं का मूल स्त्रोत उसका घोर स्वार्थवाद है।
 द प्रिंस में मैक्यावली लिखता है, “लोग न केवल डरकोप और अज्ञानी होते हैं, वरन् स्वभाव से ही दुराचारी होते हैं, वे आवश्यकता पड़ने पर ही सच्चरित्र दिखाई पड़ते हैं। लोग अपनी वासनाओं के दास और प्रथम श्रेणी के स्वार्थी होते हैं।”
 मैकियावेली मनुष्य की लोभी और स्वार्थी प्रवृत्ति की ओर इशारा करते हुए लिखता है, “अपनी संपत्ति छीनने वाले की अपेक्षा एक व्यक्ति अपने पिता के हत्यारे को अधिक सुगमता से क्षमा कर देता है।”
 मैकियावेली ने प्रेम और भय को ऐसी दो शक्तियां बताया है जिनके द्वारा मानव से कुछ काम लिया जा सकता है तथा उन्हें वश में किया जा सकता है।
मैकियावेली ने गणतंत्रीय शासन व्यवस्था पर विचार प्रकट करते हुए कहा है कि जिस राज्य के नागरिकों में मानवीय सद्गुण हो वहां गणतंत्रीय शासन कार्य कर सकता है परन्तु जिन देशों में नागरिकों में मानवीय सद्गुणों का अभाव हो वहां निरंकुश राजतंत्र ही उपयुक्त हो सकता है।
मानव स्वभाव के दुष्ट और धोखेबाज होने के कारण मैकियावेली ने सरकार को भी उतना ही निरंकुश और शक्तिशाली होने को कहा है। उसने मानवीय स्वभाव की दुर्बलताओं को ध्यान में रखते हुए राजा में शेर जैसा साहस और लोमड़ी जैसी चालाकी दोनों ही गुणों के समावेश की चर्चा की है।
 लोमड़ी के स्वरूप को छिपाए रखने के लिए राजा को उच्च कोटि का बहुरूपिया और आवश्यकता पड़ने पर अपने वचन भंग करने के लिए लोमड़ी की चाल से काम लेना चाहिए।
मैक्यावली में बताया है कि मानव स्वभाव की जो कुप्रवृतियां हैं उन्हें शिक्षा द्वारा नहीं सुधारा जा सकता उसके सुधार का प्रमुख साधन शक्ति या दमन ही है।
राजनीति और नैतिकता के संबंध के विषय में मैकियावेली में लिखा है,“राजनीति के खेल को, कूटनीतिज्ञ संबंधों को, राज्य की सुरक्षा और व्यवस्था को नैतिकता के सिद्धांतों पर खेला नहीं जा सकता। यही अच्छा है कि शासक मनुष्यों को शक्ति द्वारा नियंत्रित करता रहे।”
मैकियावेलीराजतंत्र और गणतंत्र दोनों को आदर्श मानता है किंतु अभिजात या कुलीन वर्ग को राजतंत्र और मध्यम वर्ग का विरोधी मानता है।

मैकयावेली को अपने युग का शिशु क्यों कहा जाता है

Why is Machiavelli called the baby of his era?
 राजनीतिक विचारों के इतिहास में मैकियावेली को ही अपने युग के शिशु की संज्ञा दी जाती है। इसका कारण यह है कि मैकियावेली पर अपने समकालीन राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक एवं नैतिक विचारों की छाप सबसे अधिक स्पष्ट रूप से अंकित है। वह अपने युग का एक ऐसा व्यक्ति, पर्यवेक्षक, दार्शनिक विचारक था जिसने समकालीन परिस्थितियों का सही और यथार्थ पर्यवेक्षण किया। राजनीतिक व सामाजिक दोषों को आंका तथा अपनी रचनाओं में उनके समाधान भी प्रस्तुत किए।
 मैकयावेली न केवल अपनी समकालीन परिस्थितियों से विशेषतः प्रभावित हुआ बल्कि उसने परिस्थितियों के दोषों को स्पष्ट किया और उनके समाधान भी सुझाए। मैकयावेली को पुनर्जागरण का प्रतिनिधि भी कहा जाता है।
डनिंग के अनुसार, “प्रतिभासंपन्न फ्लोरेंसवासी वास्तविक अर्थों में अपने युग का शिशु था।”

राजनीति का धर्म और नैतिकता से पृथक्करण

Separation of politics from religion and morality
 राजनीति शास्त्र के सबसे पहले और स्पष्ट रूप से राजनीति से धर्म और नैतिकता को पृथक करने वाले सिद्धांत को प्रतिपादित करने का श्रेय मैकयावेली को प्राप्त है।
 मैकयावेली किसी कार्य की अच्छाई बुराई से चिंतित नहीं था जितना कि वे उसके प्रभाव से चिंतित था। वह लिखता है, “राजा को राज्य की सुरक्षा की चिंता रहनी चाहिए, साधन तो सदैव आदरणीय ही माने जाएंगे और सामान्यतया उनकी प्रशंसा ही की जाएगी।” “न तो कोई प्राकृतिक कानून है और ना ही सार्वभौम रूप से स्वीकृत कोई अधिकार। राजनीति को नैतिकता से पूर्णतया पृथक करना चाहिए। साध्य ही साधनों का औचित्य है।”

 उसने नैतिकता को व्यक्तिगत नैतिकता एवं जन नैतिकता दो भागों में बांटा है। व्यक्तिगत नैतिकता के अंतर्गत राजा अथवा शासक के दृष्टिकोण और उसके मापदंड को रखा गया है। जन नैतिकता के बारे में उसने कहा है कि जनता का कल्याण इसी में है कि वह अपने शासक की आज्ञा का पालन करें।
 मैकयावेली लिखता है कि राजा को ऊपर से दयालु, विश्वासी, धार्मिक और सच्चा होने का ढोंग करते हुए आवश्यकता पड़ने निर्दयी, विश्वासघाती और अधार्मिक बनने को तत्पर रहना चाहिए।
 नैतिकता और सदाचार राज्य के अधीन होने चाहिए। मैकियावेली धर्म के विरुद्ध नहीं था बल्कि धर्महीन था। मैकयावेली का सुझाव है कि राजा को धर्म को धारण करने का प्रपंच अवश्य ही रचना चाहिए।
 मैकयावेली ने अपने राजनीतिक दर्शन में धर्म और नीति की घोर उपेक्षा की है। डनिंग ने लिखा है, “वह अनैतिक नहीं, नैतिकता विरोधी था और अधार्मिक नहीं धर्मनिरपेक्ष था।” फ्रेडरिक पोलक ने उसके विचारों को वैज्ञानिक तटस्थता (Scientific neutrality) की संज्ञा दी।

मैकियावेली के राज्य संबंधी विचार

Machiavelli’s state views
मैकियावेली ने राज्य को सर्वोच्च संस्था बताया है। गार्नर का मत है कि राज्य (State) शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम मेकियावेली ने ही किया था।
मैकियावेली राज्य की उत्पत्ति का कारण मनुष्य स्वभाव की आसुरी और स्वार्थी प्रवृत्ति को मानता है। मनुष्य अपनी असुविधाओं को दूर करने के लिए राज्य की स्थापना करते हैं।
 अतः राज्य एक मानवीय कृत और कृत्रिम संस्था है। मैकियावेली ने हॉब्स की भांति राज्य की उत्पत्ति में संविदा सिद्धांत का प्रतिपादन किया। वह राज्य को दो भागों में बांटता है। स्वस्थ राज्य और अस्वस्थ राज्य। स्वस्थ राज्य युद्धशील होता है और निरंतर संघर्ष में लगा रहता है।
मैकियावेली ने राज्य के संदर्भ में स्पष्ट रूप से संप्रभुता शब्द का कहीं भी प्रयोग नहीं किया है। अंतरराष्ट्रीय मामलों में मेकियावेली सीमित संप्रभुता की आवश्यकता को स्वीकार करता है। मैकियावेली शासक द्वारा निर्मित विधि की कल्पना करता है और उनके अनुसार विधि का स्त्रोत शासक ही है।
 प्रिंस के 18वें अध्याय में मैकियावेली ने राजा के आचरण के सिद्धांत और कर्तव्यों के बारे में उल्लेख किया है जो निम्न हैं –
1. अधिकाधिक शक्ति का अर्जन करना। क्योंकि मैकियावेली शक्ति ही सत्य है में विश्वास करता है। शक्ति मैकियावेली की समस्त राजनीतिक विचारधारा का केंद्रीय तत्व है।
2. साम-दाम-दंड-भेद को आवश्यकतानुसार प्रयोग में लाना।
3. शेर और लोमड़ी के गुणों को धारण करना
4. क्रूरता का एक साथ प्रदर्शन करना
5. राष्ट्रीय सेना का गठन करना
6. कानूनों का कठोरता पूर्वक पालन करवाना
7. सैनिक शक्ति का विस्तार और युद्ध की स्थिति बनाए रखना
8. आचरण भय मुक्त हो लेकिन घृणित नहीं
9. सम्मानपूर्ण आचरण।

मैकियावेली के सरकार का वर्गीकरण

Machiavelli’s government classification
मैकियावेली के लिए आदर्श शासन वही है जो पूर्णतया सफल हो और जिसकी सता मजबूत हो। शासनों को उनके शुद्ध और विकृत रूप मानकर 6 भागों में विभक्त किया है।
शासन का शुद्ध रूप       • शासन का विकृत रूप
1. राजतंत्र                        1. तानाशाही
2. कुलीन तंत्र                    2. धनिक तंत्र या वर्गतंत्र
3. वैध प्रजातंत्र                  3. प्रजातंत्र

 मैकियावेली के अनुसार शासन प्रणालियों का वर्गीकरण
आदर्श रूप                                व्यावहारिक रूप
    |                                                    |
 गणतंत्र                                          राजतंत्र
    |                                                    |
सच्चरित्र लोगों के लिए            भ्रष्ट लोगों के लिए

 मैकियावेली का मानना है कि राजतंत्र या गणतंत्र इसमें से कोई भी शासन व्यवस्था सभी परिस्थितियों के लिए ठीक नहीं है। वह आदर्श शासन गणतंत्र को मानता है। सामान्य स्थिति में राजा मूर्ख होते हैं, जबकि लोगों में निर्णय लेने और न्याय करने की क्षमता अधिक होती है। सामान्य परिस्थिति में उनका झुकाव गणतंत्र की और है किंतु तात्कालिक संकटकाल के लिए राजतंत्र को ही उपयुक्त समझता है।
मेकियावेली शासनों का वर्गीकरण केवल दो रूपों राजतंत्र तथा गणतंत्र में करता है। डनिंग के अनुसार, “प्रिंस मुख्यतया राजनीतिक प्रदेश के विस्तार के संबंध में राजतंत्र का अध्ययन है और डिसकोर्सेज भी उसी उद्देश्य के लिए लोकप्रिय शासन (गणतंत्र) का अध्ययन है।” इटली के लिए तात्कालिक परिस्थितियों के आधार पर एक सुदृढ़ राज्य व्यवस्था प्रदान करने के लिए मैकियावेली ने निरंकुश राजतंत्र के शासन का समर्थन किया था।
 मैकियावेली को केवल निरंकुश राजतंत्र का समर्थक नहीं मान सकते हैं। उन्होंने गणतंत्र (लोकतंत्र) का भी पूर्ण समर्थन किया था। परंतु मैकियावेली को सबसे अधिक घृणा कुलीन तंत्र से थी। कुलीन तंत्र को वह अवांछनीय मानता था और कहता था कि कुलीन तंत्र का उद्देश्य सता धारण किए रखने की आकांक्षा में ही निहित रहता है और जनसाधारण के हितों की सर्वदा उपेक्षा करता है।
 मेकियावेली के अनुसार जहां जहां संभव हो वहां गणतंत्र व्यवस्था, आवश्यक हो वहां राजतंत्र, परंतु कुलीन तंत्र व्यवस्था कहीं भी उचित नहीं है। राजतंत्रीय शासन में भी शासक वंशानुगत न होकर निर्वाचित होना चाहिए।

मैकियावेली के युद्ध संबंधी विचार

Machiavelli’s war thoughts
मैकियावेली के अनुसार शासक का युद्ध में विजय का उद्देश्य पराजित देश की प्रजा को अपने अधीन करना इतना लाभकारी नहीं है जितना कि उस देश की जनता का सौहार्द प्राप्त करना है। विजित प्रदेशों में शासक अपने उपनिवेश कायम करें, पराजित देश से लूट में प्राप्त धन से अपने कोष की वृद्धि करें।
  युद्ध में छापामारी के साधन अपनाने की अपेक्षा युद्ध भूमि में खुला युद्ध करें। राज्य को धनी बनाए रखे न की व्यक्तियों को। शासक को चाहिए कि वह पर्याप्त सावधानी तथा सतर्कता के साथ एक शक्तिशाली प्रशिक्षित सेना का निर्माण करें। सेना राज्य विस्तार तथा राज्य की सुरक्षा दोनों के लिए आवश्यक है। सेना पर ही राज्य की शक्ति निर्भर करती है चाहे राज्य के पास कितना ही धन क्यों न हो वह उसकी शक्ति का परिचायक नहीं है। सेना के लिए उत्तम प्रकार के सैनिक आवश्यक है।
  धन द्वारा खरीदे गए सैनिकों से सेना सुदृढ़ नहीं हो सकती है। उत्तम सैनिकों की सेना विजयों द्वारा धन अर्जित कर सकती है। सैनिकों में शारीरिक बल का होना ही आवश्यक नहीं है अपितु उन्हें सैनिक कला के ज्ञान से युक्त होना चाहिए। मैकियावेली राज्य के निष्ठावान तथा अनुशासित नागरिकों की सेना के निर्माण को महत्व देता है।
राज्य की सुरक्षा एवं प्रतिरक्षा के लिए उसे राष्ट्रभक्त नागरिकों की सेना निर्मित करनी चाहिए। भाड़े पर लाए गए सैनिकों की सहायता से देश रक्षा की आशा नहीं की जा सकती है। शासक को स्वयं भी युद्ध कला में प्रवीण होना आवश्यक है। साथ ही सेना के समुचित प्रशिक्षण तथा सैनिक सज्जा में किसी भी प्रकार की कमी नहीं रखनी चाहिए।

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