अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली क्या है (Presidential System)

अध्यक्षीय शासन प्रणाली क्या है

What is presidential governance system
शासन प्रणालियों के विभिन्न प्रकार के अंतर्गत आज हम अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली (प्रेसिडेेंन्सियल सिस्टम) के बारे में चर्चा करेंगे।
 जिस शासन व्यवस्था में कार्यपालिका प्रधान व्यवस्थापिका से बिल्कुल अलग होता है और शासन विभाग का प्रधान एक ऐसा व्यक्ति होता है जो व्यवस्थापिका के प्रति उत्तरदायी नहीं होता, उसे अध्यक्षात्मक शासन कहते हैं।
अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली क्या है, अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली की विशेषताएं
Presidential Governance System
 डॉ. गार्नर के अनुसार, "अध्यक्षात्मक सरकार वह होती है जिसमें कार्यपालिका अर्थात राज्य का अध्यक्ष तथा उसके मंत्री संविधान की दृष्टि से अपनी अवधि के बारे में विधानमंडल से स्वतंत्र होते हैं और अपनी राजनीतिक नीतियों के बारे में भी उसके प्रति अनुत्तरदायी होते हैं।"
गैटल के अनुसार, "अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली वह प्रणाली है जिसमें कार्यपालिका प्रधान अपने कार्यकाल और बहुत कुछ सीमा तक अपनी नीतियों और कार्यों के बारे में विधानमंडल से स्वतंत्र होता है।"
 अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली का आधार शक्तियों के पृथक्करण का सिद्धांत है। इसमें व्यवस्थापिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका सभी एक दूसरे से पृथक व स्वतंत्र रहकर अपने कार्य करते हैं।
 कार्यपालिका शक्तियां राष्ट्रपति में ही निहित होती है जिसका प्रयोग वह स्वतंत्रतापूर्वक करता है। राष्ट्रपति या उसके मंत्री व्यवस्थापिका के न तो सदस्य होते हैं और ना ही उसकी कार्यवाहियों में भाग लेते हैं।
 राष्ट्रपति का कार्यकाल भी निश्चित होता है। व्यवस्थापिका उसे अविश्वास प्रस्ताव द्वारा नहीं हटा सकती (महाभियोग के द्वारा हटा सकती है)। इसी प्रकार व्यवस्थापिका भी अपने गठन कार्यों तथा कार्यकाल की दृष्टि से पृथक व स्वतंत्र होती है।

अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली वाले देश

Countries with presidential governance system
अध्यक्षीय प्रणाली का सबसे उपयुक्त उदाहरण संयुक्त राज्य अमेरिका है। इसके अतिरिक्त राष्ट्रपति प्रणाली को अपनाने वाले अन्य देश ब्राजील, पाकिस्तान, फिलीपीन गणराज्य, लाइबेरिया तथा मध्य और दक्षिणी अमेरिका (लेटिन अमेरिका) के अधिकांश देश है।

अर्द्ध अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली

Semi presidential system
कई गणराज्यों में राष्ट्रपति के अधीन एक अतिरिक्त पदाधिकारी और होता है तथा कार्यकारी शक्तियां दोनों पर विभिन्न मात्रा में निहित होती है। इन्हें अर्द्ध अध्यक्षीय प्रणाली कहा जाता है।
 यह संसदीय और अध्यक्षीय शासन प्रणाली का मिश्रित रूप है। इसमें प्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित राष्ट्रपति के पास व्यापक शक्तियां होती है। राष्ट्रपति प्रधानमंत्री की नियुक्ति संसद में से करता है। जहां अध्यक्षात्मक शासन की विशेषताएं तो पाई जाती है परंतु साथ ही राष्ट्रपति की स्थिति महत्वपूर्ण तथा कुछ सीमा तक ही शक्तिशाली होती है और प्रधानमंत्री के पद का भी आयोजन किया जाता है तथा उसे भी कुछ शासन संबंधी अधिकार प्राप्त होते हैं। ऐसी व्यवस्था में मंत्रिमंडल कभी राष्ट्रपति के तथा कभी विधानमंडल के प्रति उत्तरदायी होता है।
 श्रीलंका, फ्रांस, पुर्तगाल, बुल्गारिया, कुछ सीमा तक जर्मनी, रूस, नामीबिया, मोजांबिक आदि देशों में अर्द्ध अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली है।
श्रीलंका में राष्ट्रपति देश का प्रमुख होता है तथा प्रधानमंत्री सरकार का प्रमुख होता है। दोनों का चुनाव प्रत्यक्ष मतदान द्वारा होता है। प्रधानमंत्री और उसका मंत्रिपरिषद विधायिका के प्रति जवाबदेह होता है। राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और अन्य मंत्रियों की नियुक्ति करता है परंतु उसे पद से हटा नहीं सकता क्योंकि वे संसद के प्रति उत्तरदायी होते हैं।
फ्रांस में "एक व्यवस्थापिका जो मंत्रिमंडल के समक्ष निर्बल है था एक मंत्रिमंडल जो राज्याध्यक्ष के समक्ष निर्बल है।"


अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली की विशेषताएं

Characteristics of presidential governance system
1. कार्यपालिका का कार्यकाल निश्चित
 कार्यपालिका के प्रधान का निर्वाचन एक निश्चित समय के लिए किया जाता है और महाभियोग के अतिरिक्त अन्य किसी प्रकार से उसे उसके कार्यकाल के पूर्व उसके पद से नहीं हटाया जा सकता है।
2. कार्यपालिका और व्यवस्थापिका एक दूसरे से पृथक
 यह शासन व्यवस्था मॉण्टेस्क्यू के शक्ति पृथक्करण सिद्धांत पर आधारित है और इसमें कार्यपालिका तथा व्यवस्थापिका एक दूसरे से स्वतंत्र रहती है।
 व्यवस्थापिका और कार्यपालिका एक दूसरे के कार्यों में किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं करती।
3. नाम मात्र की और वास्तविक कार्यपालिका अलग-अलग नहीं
 इस शासन व्यवस्था में संसदात्मक शासन के समान नाम मात्र की और वास्तविक कार्यपालिका अलग-अलग नहीं होती है। राष्ट्रपति जो देश का वैधानिक प्रधान होता है व्यवहार में भी कार्यपालिका शक्तियों का उपयोग करता है।
 राष्ट्रपति राज्य व सरकार दोनों का ही प्रधान होता है। अतः कार्यपालिका की स्थिति सुदृढ़ होती है। संसदात्मक शासन में जिस प्रकार प्रधानमंत्री की महत्ता है वैसी ही अध्यक्षात्मक शासन में राष्ट्रपति की होती है।
4. वास्तविक मंत्रिमंडल नहीं होता
अध्यक्षात्मक पद्धति में वस्तुतः मंत्रिमंडल नहीं होता है। सिर्फ राष्ट्रपति को सहायता पहुंचाने तथा सलाह देने के लिए कुछ सचिव होते हैं। संसदीय प्रणाली की भांति वे एक इकाई या टीम का निर्माण नहीं करते हैं। मंत्रिगण राष्ट्रपति के प्रति उत्तरदायी होते हैं, उसकी आज्ञा के अनुसार ही कार्य करते हैं तथा उसकी इच्छापर्यंत अपने पद पर रहते हैं।
अमेरिकी राष्ट्रपति मंत्रिमंडल की सलाह मानने के लिए बाध्य नहीं है। अमेरिकी मंत्रिमंडल एक सलाहकार समिति है जिसका अमेरिकी संविधान में कोई वर्णन नहीं किया गया है (अमेरिकी मंत्रिमंडल संविधान का शिशु नहीं है)। इसका अस्तित्व पृथागत है। राष्ट्रपति मंत्रियों की नियुक्ति सिनेट के अनुमोदन सहित करता है।
अमेरिकी राष्ट्रपति एण्ड्रू जैक्सन अपने मंत्रिमंडल को 'किचन केबिनेट' (Kitchen Cabinet) कहते थे।
5. उत्तरदायित्व का अभाव
इस पद्धति में कार्यपालिका व्यवस्थापिका के प्रति उत्तरदाई नहीं होती। विधायका न तो उससे प्रश्न पूछ सकती है और न उसे अविश्वास प्रस्ताव द्वारा पदच्युत कर सकती है। अमेरिका में राष्ट्रपति का उत्तरदायित्व अपने निर्वाचन के प्रति होता है।
अमेरिका में संविधान लागू होने से अभी तक एक ही बार राष्ट्रपति पर महाभियोग लगाया गया किंतु वह भी सिद्ध नहीं हो सका। क्योंकि महाभियोग सिद्ध करना अत्यंत कठिन प्रक्रिया है।
6. नियंत्रण एवं संतुलन सिद्धांत का पालन
अध्यक्षीय शासन प्रणाली में शासन के तीन अंग वैसे तो एक दूसरे से स्वतंत्र है परंतु अपने कार्यों के लिए उन्हें एक दूसरे के समर्थन या सहायता की आवश्यकता होती है। जिससे शक्तियों का पृथक्करण होते हुए भी नियंत्रण एवं संतुलन बना रहता है।
 उदाहरण के लिए अमेरिका में कार्यपालिका के उच्च अधिकारियों की नियुक्ति और विदेशों से संधि करने की शक्ति राष्ट्रपति के हाथ में है, परंतु इसके लिए उसे कांग्रेस के उच्च सदन और सीनेट का अनुमोदन प्राप्त करना अनिवार्य होता है।
 कांग्रेस के पास विधि निर्माण की शक्ति प्राप्त है, परंतु इस हेतु राष्ट्रपति की अनुमति अनिवार्य है। अपराध संबंधी दंड का निर्णय न्यायपालिका के अंतर्गत है परंतु अपराधी को क्षमा करने और दंड कम करने का अधिकार राष्ट्रपति को प्राप्त है। कार्यपालिका और न्यायपालिका दोनों को अपने-अपने क्षेत्रों में खर्च करने की स्वीकृति विधानमंडल से लेनी पड़ती है।
संसदीय, अर्द्ध अध्यक्षात्मक, अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली

संसदीय और अध्यक्षीय शासन प्रणाली में अंतर

Difference between parliamentary and presidential governance system
1. संसदात्मक शासन में कार्यपालिका का कार्यकाल निश्चित नहीं होता और व्यवस्थापिका अविश्वास का प्रस्ताव पास कर कार्यपालिका को किसी भी समय उसके पद से हटा सकती है।
 लेकिन अध्यक्षात्मक शासन में कार्यपालिका का कार्यकाल निश्चित होता है और महाभियोग के अतिरिक्त अन्य किसी उपाय से कार्यपालिका को निश्चित समय से पूर्व नहीं हटाया जा सकता है।
2. संसदात्मक शासन व्यवस्था में कार्यपालिका का प्रधान कार्यपालिका का नाममात्र का प्रधान होता है। सैद्धांतिक रूप से उसे समस्त शक्तियां प्राप्त होती है किंतु व्यवहार में उसके द्वारा अपनी शक्तियों का प्रयोग नहीं किया जा सकता है।
 लेकिन अध्यक्षात्मक शासन व्यवस्था में कार्यपालिका प्रधान नाममात्र का प्रधान ही न होकर वास्तविक प्रधान होता है। वही मंत्रीपरिषद को नियुक्त करता है और मंत्रिपरिषद पूर्ण रूप से उसके अधीन होती है।
3. संसदात्मक शासन में कार्यपालिका का निर्माण व्यवस्थापिका में से ही किया जाता है और यह व्यवस्थापिका के प्रति ही उत्तरदाई होती है।
 लेकिन अध्यक्षात्मक शासन में व्यवस्थापिका और कार्यपालिका एक दूसरे से स्वतंत्र होती है कार्यपालिका के सदस्य साधारणतया व्यवस्थापिका में उपस्थित नहीं हो सकते। कानून निर्माण संबंधी कार्यों में भाग नहीं ले सकते हैं और व्यवस्थापिका द्वारा भी कार्यपालिका पर नियंत्रण नहीं रखा जाता है। संसदीय और अध्यक्षीय शासन में सबसे प्रमुख अंतर सरकार के इन दो अंगो (व्यवस्थापिका और कार्यपालिका) के आपसी संबंध के विषय में ही है।
👉अध्यक्षात्मक शासन संबंधी डॉ ए के वर्मा का वीडियो 👇

4. संसदात्मक शासन में मंत्रियों की स्थिति बहुत उच्च होती है। वे अपने विभाग के सर्वेसर्वा होते हैं और कानून निर्माण कार्य पर भी पर्याप्त प्रभाव रखते हैं।
 किंतु अध्यक्षात्मक शासन में राष्ट्रपति के अधिकार के अंतर्गत जो मंत्रिपरिषद होती है उसके सदस्यों की स्थिति इतनी उच्च नहीं होती। वह पूर्णता राष्ट्रपति के अधीन होते हैं और कानून निर्माण पर उसके द्वारा कोई प्रभाव नहीं डाला जा सकता है।
5. अध्यक्षात्मक शासन में राष्ट्रपति का चुनाव हो जाने के पश्चात प्राय: विरोधी दल शांत हो जाते हैं।
 लेकिन संसदात्मक शासन में विरोधी दल शासक दल की प्रत्येक बात का विरोध करते हैं और सत्ता प्राप्त करने की कोशिश करते रहते हैं।
6. शांति काल के लिए संसदीय प्रणाली अधिक उपयुक्त है लेकिन संकट काल के लिए अध्यक्षीय प्रणाली अधिक उपयोगी है।
7. संसदीय प्रणाली का आधार शक्तियों का संयोग (Fusion of Power) है जबकि अध्यक्षात्मक प्रणाली का आधार शक्ति पृथक्करण (Separation of Power) का सिद्धांत है।
8. संसदीय शासन को अनाड़ियों का शासन जबकि अध्यक्षीय शासन को विशेषज्ञों का शासन कहा गया है।
9. संसदीय शासन प्रणाली मैं राज्य के अध्यक्ष द्वारा सरकार के अध्यक्ष की नियुक्ति की जाती है। लेकिन अध्यक्षात्मक शासन में राज्य और सरकार का अध्यक्ष एक ही व्यक्ति होता है और जनता द्वारा प्रत्यक्ष रूप से चुना जाता है।
10. संसदात्मक और अध्यक्षात्मक दोनों ही व्यवस्थाएं लोकतंत्र के भेद हैं। लेकिन इस संबंध में यह कहना उचित है कि संसदीय शासन अध्यक्षात्मक शासन की तुलना में अधिक जनतंत्रात्मक है।
 जनतंत्र का तात्पर्य जनता की इच्छा के अनुसार शासन है और ऐसा केवल संसदीय शासन में ही संभव है। क्योंकि यही एकमात्र ऐसी व्यवस्था है जिसमें वास्तविक शासन (मंत्रिमंडल) जनप्रतिनिधियों (व्यवस्थापिका) के प्रति उत्तरदाई होता है।
अगर संसदीय और अध्यक्षीय शासन प्रणालियों में समानता की बात की जाए तो दोनों ही व्यवस्थाएं प्रतिनिधित्व पूर्ण है।
Previous
Next Post »