व्यवहारवाद की मूल मान्यताएं या विशेषताएं

व्यवहारवाद का स्वरूप और मूल मान्यताएं/ विशेषताएं

 व्यवहारवाद आज बहुत अधिक प्रचलित और व्यापक हो गया है, किंतु इसके अर्थ के संबंध में सभी का दृष्टिकोण (approach) समान नहीं है कुछ विद्वानों के अनुसार यह केवल एक मनोदशा (Mood) या मनोवृति है, तो कुछ विचारकों की दृष्टि में इसके अपने निश्चित विचार, सिद्धांत और कार्यविधियां है।
vyvharvad ki manyataen or visheshataen
Behavioralism : मूल मान्यताएं और विशेषताएं
द्वितीय महायुद्ध (world war ll) और 1960 के बीच व्यवहारवाद (behaviouralism) एक साथ ही एक उपागम (approach) और एक चुनौती, एक अभिनवीकरण (innovation) और एक सुधार आंदोलन, एक विशेष प्रकार का अनुसंधान (research) और एक जमघट जमाने वालों की पुकार के रूप में माना जाता रहा है। लेकिन व्यवहारवाद ने अनिश्चितता की स्थिति को पार कर लिया है और अब इसके अर्थ पर्याप्त निश्चित हो गए हैं।
 व्यवहारवाद की दार्शनिक उत्पत्ति 19 वीं सदी में काम्टे के लेखन, 1920 में वियना वृत (Vienna Circle) के तार्किक प्रत्यक्षवाद एवं भाषा दर्शन (logical positivism) में देखी जाती है। इन विद्वानों ने दर्शन का अर्थ या तो 'दोयम दर्जे' का अध्ययन (second order study) माना है अथवा उसे ऐसे लेखन की संज्ञा दी है जिस का राजनीतिक जीवन से कोई संबंध नहीं था।
 क्रिक पैट्रिक (Kirk Patrick) ने व्यवहारवाद के स्वरूप का स्पष्टता और विशदता के साथ विवेचन किया है, इसके अनुसार व्यवहारवाद की निम्न चार विशेषताएं हैं-
1. यह इस बात पर बल देता है कि राजनीतिक अध्ययन और शोध कार्य में विश्लेषण (analysis) की मौलिक इकाई संस्थाएं न होकर व्यक्तिगत होना चाहिए।
2. यह सामाजिक विज्ञानों (Social Sciences) को व्यवहारवादी विज्ञानों के रूप में देखता है और राजनीति विज्ञान की अन्य सामाजिक विज्ञान के साथ एकता पर बल देता है।
3. यह तथ्यों के पर्यवेक्षण (supervision), वर्गीकरण (classification) और माप के लिए अधिक परिशुद्ध प्रविधियों (perfect technique) के विकास और उपयोग पर बल देता है और इस बात का प्रतिपादन करता है कि जहां तक संभव हो, सांख्यिकीय (statistical) या परिमाणात्मक सूत्रों का उपयोग किया जाना चाहिए।
4. यह राजनीति विज्ञान के लक्ष्य को एक व्यवस्थित आनुभविक सिद्धांत (empiric theory) के रूप में  परिभाषित करता है।

 व्यवहारवाद की मान्यताएं

* अध्ययन की इकाई जितनी छोटी होगी अध्ययन उतना ही गहन एवं वैज्ञानिक (scientist) होगा।
* राजनीतिक विज्ञान को जब तक वैज्ञानिक अध्ययन नहीं बनाया जाएगा तब तक उसकी अवधारणा और निष्कर्ष स्थाई निश्चित तथा सार्वजनिक नहीं बन सकेंगे।
* ज्ञान के क्षेत्र में वैज्ञानिक विधि से संचित एवं सुरक्षित ज्ञान की समग्रता एवं सच्चाई इस पर निर्भर करेगी कि वह विज्ञान के अन्य पहलुओं से कितना संबंधित है।
* अनुभवमूल्क सिद्धांत (experience theory) का प्रयोग आवश्यक है।
* प्राकृतिक विज्ञान (natural science) और समाज विज्ञानों के बीच एक गुणात्मक निरंतरता है।
 व्यवहारवाद का अधिकारी विद्वान डेविड ईस्टन (David Easton) को कहा जाता है। David Easton ने अपने लेख  the current meaning of behaviouralism में व्यवहारवाद की 8 विशेषताओं को 'बौद्धिक आधारशिला' (Intellectual foundation) की संज्ञा दी है। यह 8 विशेषताएं निम्न प्रकार है-


1. नियमन Regularization

व्यवहारवादी मानते हैं कि राजनीतिक व्यवहार में सामान्य तत्व ढूंढे जा सकते हैं, उन्हें राजनीतिक व्यवहार के सामान्यीकरणों (generalization) अथवा सिद्धांतों के रूप में व्यक्त किया जा सकता है और इनके आधार पर मानवीय व्यवहार की व्याख्या और भविष्य के लिए संभावनाएं व्यक्त की जा सकती है।

2. सत्यापन Verification

 मानवीय व्यवहार (human behavior) के संबंध में एकत्रित सामग्री को दोबारा जांचनें और उसकी पुष्टि करने की क्रिया को सत्यापन कहते हैं। व्यवहारवादी अध्ययन पद्धति की एक विशेषता यह है कि उसके अंतर्गत एकत्रित की गई सामग्री का सत्यापन किया जाता है।

3. तकनीकी प्रयोग Use of Technique

 आधार सामग्री प्राप्त करने एवं उनकी व्याख्या करने के साधनों को स्वयं सिद्ध नहीं माना जा सकता। वे समस्यात्मक होते हैं और स्वयं अध्ययनकर्ता द्वारा इन्हें सावधानी से शुद्ध एवं परीक्षित किए जाने की आवश्यकता है।
 मानवीय व्यवहार का पर्यवेक्षण करने और उसका विश्लेषण कर परिणामों को अंकित करने के लिए कठोर शुद्धिकरण के साधनों को अपनाया जाना चाहिए। परिशुद्धिकरण की प्रक्रिया ज्ञान को विकासशीलता प्रदान करती है और इसके आधार पर नए तथ्य प्राप्त किए जाने पर पुरानी सामग्री को अप्रमाणित ठहराया जा सकता है।

4. परिमाणनीकरण Quantification

 उपलब्धियों के विवरण तथा आधार सामग्री को लेखबद्ध करने तथा उसमें सुस्पष्टता लाने के लिए मापन और परिमाणनीकरण किया जाना चाहिए। मापन और परिमाणनीकरण का यह कार्य उनके अपने लिए नहीं वरन अन्य प्रयोजनों के प्रकाश में किया जाना चाहिए।

5. मूल्य निरपेक्षता (Values free) व आदर्श निर्माण (Model Building)

 सामान्य व्यवहारवादी मूल्यों की दृष्टि से तटस्थ रहना चाहते है, फिर भी नैतिक मूल्यांकन (moral assessment) के कुछ मूल्यों एवं आदर्शों का प्रतिपादन और प्रयोग आवश्यक हो जाता है।
 इस संबंध में अपनाए गये मूल्यों और आदर्शों को अध्ययनकर्ता के मूल्यों और आदर्शों से अलग रखा जाना चाहिए और सामान्य मूल्य व आदर्श अध्ययनकर्ता के मूल्यों व आदर्शों से अप्रभावित रहने चाहिए।

6. व्यवस्थाबद्धीकरण Systematization या क्रमबद्धीकरण 

अनुसंधान का आधार तथा उसका लक्ष्य सिद्धांत होना चाहिए। सिद्धांत को तथ्य से अलग नहीं किया जा सकता है और तथ्यों के विश्लेषण में सिद्धांतों की उपेक्षा नहीं की जा सकती है।

7. विशुद्ध विज्ञान Pure Science

  व्यवहारवादी मूलत विशुद्ध विज्ञान के दृष्टिकोण को अपनाते हैं। यह राजनीतिक समस्याओं के समाधान के लिए प्रभावशाली होगा। राजनीति के विशुद्ध विज्ञान का निर्माण करने के लिए प्राकृतिक विज्ञान की तरह परिष्कृत पद्धतियों का प्रयोग करने पर बल देते हैं।

8. समग्रता या एकीकरण Integration

व्यवहारवादियों की अध्ययन शैली अंतः विषयक (interdisciplinary) है। मनुष्य का राजनीतिक व्यवहार अनेक गैर राजनीतिक कारकों को यथा सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक से प्रभावित होता है अतः मानव व्यवहार का खंड दृष्टि से अध्ययन किया जाना संभव नहीं है।
 व्यवहारवादी राजनीति को एक पृथक अथवा ज्ञान की विशिष्टता का नहीं मानते हैं। व्यवहारवादी उपागम राजनीतिशास्त्र एवं अन्य समाज विज्ञानों से संबंध बनाकर अनुशासनात्मक अध्ययन (disciplinary study) पर बल देता है। व्यवहारवादी दृष्टिकोण में राजनीति विज्ञान को नवीन मूल्य, नयी भाषा, नयी पद्धत्तियां और नवीन दृष्टिकोण प्रदान किए हैं।
 व्ययवहारवादियों की मान्यता है कि समस्त मानव व्यवहार एक ही पूर्ण इकाई है और उसका अध्ययन खंडों में नहीं होना चाहिए।
 व्यवहारवाद के अनुसार मानव व्यवहार बाद में एक मूलभूत एकता पाई जाती है तथा इसी कारण विभिन्न समाज विज्ञान परस्पर अत्यंत समीप है। अतः राजनीतिक व्यवहार का अध्ययन जीवन के अन्य पक्षों के संदर्भ में ही किया जाना चाहिए।
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