व्यवहारवाद : अर्थ, विशेषताएं और ऐतिहासिक विकास

व्यवहारवाद क्या है ; व्यवहारवाद का अर्थ ; व्यवहारवाद की विशेषता ; व्यवहारवाद के जनक/प्रतिपादक

 द्वितीय महायुद्ध के पश्चात परंपरागत राजनीति विज्ञान के विरोध में एक व्यापक क्रांति प्रारंभ हुई, जिसने सभी समाज विज्ञानों को प्रभावित किया। इस क्रांति को ही व्यवहारवाद (behaviorism) का नाम दिया जाता है। यह व्यवहारवादी क्रांति 'नये राजनीति विज्ञान' के साथ इतनी अधिक जुड़ी हुई है कि इसे 'राजनीति के वैज्ञानिक अध्ययन का सहचर' कहा जा सकता है।
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व्यवहारवाद : अर्थ, विशेषता और ऐतिहासिक विकास

 व्यवहारवाद या व्यवहारवादी उपागम (behaviorism approach) राजनीतिक तथ्यों की व्याख्या और विश्लेषण का एक विशेष तरीका है, जिसे द्वितीय महायुद्ध के बाद अमेरिकी राजवैज्ञानिकों द्वारा विकसित किया गया।
 यद्यपि इसकी जड़े महायुद्ध के पूर्व ग्राहम वाल्स और ब्रैंडले आदि की रचनाओं में देखी जा सकती है। यह उपागम राजनीति विज्ञान के संदर्भ में मुख्यतः अपना ध्यान राजनीतिक व्यवहार पर केंद्रित करता है और इस बात का प्रतिपादन करता है कि राजनीतिक गतिविधियों का वैज्ञानिक अध्ययन व्यक्तियों के राजनीतिक व्यवहार के आधार पर ही किया जा सकता है।
 व्यवहारवाद अनुभवात्मक (Empirical) और क्रियात्मक (Functional) है तथा इसमें व्यक्ति निष्ठ मूल्यों और कल्पनाओं आदि के लिए कोई स्थान नहीं है। व्यवहारवाद इस दृष्टि से परंपरावादियों के नितांत विरुद्ध है कि वह राजविज्ञान को राज्य की कानूनी एवं दार्शनिक सीमाओं में बांधने के लिए तैयार नहीं है।
 व्यवहारवाद के अनुसार राज्य के बाहर भी सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्र की जो संस्थाएं और सताएँँ और इन सबको प्रेरित करने वाला जो मानसिक व्यवहार है, उसका अध्ययन अधिक आवश्यक और महत्वपूर्ण है।
 व्यवहारवाद (behaviorism) का प्रणेता डेविड ईस्टन है। डेविड ईस्टन व्यवहारवाद के संबंध में लिखते हैं कि, "व्यवहारवाद वास्तविक व्यक्ति पर अपना समस्त ध्यान केंद्रित करता है। व्यवहारवाद के अध्ययन की इकाई मानव का ऐसा व्यवहार है जिसका प्रत्येक व्यक्ति द्वारा पर्यवेक्षण, मापन और सत्यापन किया जा सकता है। व्यवहारवाद राजनीतिक व्यवहार के अध्ययन से राजनीति की संरचनाओं, प्रक्रियाओं के बारे में वैज्ञानिक व्याख्याएँ विकसित करना चाहता है।
 परंपरावादी दृष्टिकोण या परंपरागत राजनीति विज्ञान की प्रकृति, स्वरूप, दृष्टिकोण एवं क्षेत्र के विरोध के रूप में तथा राजनीति विज्ञान को विज्ञान के स्तर पर लाने या उसे समाज उपयोगी बनाने के लिए एक प्रयास के रूप में व्यवहारवाद का आगमन हुआ। जिसने द्वितीय महायुद्ध के बाद आंदोलन का एक रूप ले लिया। उसे ही राजनीति विज्ञान के क्षेत्र में व्यवहारवादी क्रांति के नाम से जाना जाता है।
 इस दृष्टिकोण को विकसित करने का श्रेय अमेरिकी राजनीति शास्त्रियों को जाता है। जिनमें मेरियम, लॉसवेल, आलमंड, शिल्स, डेविड ईस्टन का नाम सर्वाधिक महत्वपूर्ण है।
 व्यवहारवाद (behaviorism) की व्याख्या राजनीति विज्ञान को वास्तविक बनाने के प्रयास के रूप में किया जा सकता है। यह राजनीतिक संस्था व संरचना के स्थान पर केंद्रित अध्ययन पर जोर देता है। वैज्ञानिक परिशुद्धता, पर्यवेक्षण, सत्यापन, परिक्षण, परिमापन इत्यादि भारत के प्रमुख आधार हैं।
 व्यवहारवाद राजनीति के अध्ययन शोध व विश्लेषण के लिए अनुभवात्मक और प्रकार्यात्मक (Empirical and Functional) दृष्टिकोण पर जोर देता है जो राजनीति विज्ञान को संस्थागत, कानूनी एवं दार्शनिक सीमा में न बांधकर अपने अध्ययन का केंद्रबिंदु राजनीतिक व्यवहार को ही मानता है। व्यवहारवाद मनुष्य के केवल बाह्य कार्यों से ही संबंध नहीं रखता वरन वह उसकी भावनात्मक प्रक्रियाओं से भी संबंध है। यह मनुष्य के मनोभावात्मक, बोधात्मक तथा दृष्टिकोणात्मक तत्वों का अध्ययन करता है।
 व्यवहारवाद का कोई निश्चित सिद्धांत नहीं है जिसकी अपनी निश्चित मान्यता और नियम हो। इसे एक मनोदशा (Mood) व अनुनय (Persuasion) कहा गया है। जोसेफ उन्नर, डेविड ट्रूमैन, किर्क पेट्रिक, सिबली आदि ने वैज्ञानिक पद्धति को ही व्यवहारवादी शोध मानते हुए वास्तविक व्यक्ति पर अपना ध्यान केंद्रित किया है।
 व्यवहारवाद एक ऐसा दृष्टिकोण है जिसका उद्देश्य नई इकाइयों, नई पद्धतियों, नई तकनीकों के तथा एक व्यवस्थित सिद्धांत का विकास करना है।
 व्यवहारवाद का ऐतिहासिक विकास संयुक्त राज्य अमेरिका में राज्य विज्ञान के यथार्थवादी तथा अनुभववादी दृष्टिकोण के साथ जुड़ा हुआ है। यह उल्लेखनीय है कि उन्नीसवीं सदी के अंत में ब्राइस आदि की रचनाओं में संस्थाओं के व्यवहार पर बल दिया जाने लगा, जिसे ईस्टन ने यथार्थ में शोध का काल (Phase of realism in research) कहा है।
 परंतु यथार्थ (Realism) के इस काल से व्यवहार (behaviour) पर आने में 1980 में प्रकाशित दो पुस्तकें ग्राहम वॉल्स की 'Human Nature in Politics' एवं बेंटले (Bentley) की 'The Process of Government' महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इन्होंने मनोवैज्ञानिक प्रभाव मे सामाजिक समूहों के कार्यों के अध्ययन को महत्वपूर्ण माना।
 इसके बाद 1920 के दशक में चार्ल्स ई. मेरियम द्वारा "Conference on the Science of Politics", 1925 ईस्वी में एवं अपनी रचनाओं में मनोविज्ञान, समाजशास्त्र आदि सामाजिक अनुशासनों की पद्धतियों के उपयोग का आग्रह किया गया और चार्ल्स ई. मेरियम के सहयोगियों एवं विद्यार्थियों के द्वारा शिकागो में वैज्ञानिक पद्धति एवं अंतर अनुशासनात्मक अध्ययन की शुरुआत हुई।
मेरीयम को व्यवहारवादी आंदोलन का 'बौद्धिक पिता' कहा जाता है। मेरियम की पुस्तक ''New Aspect of Politics' 1925 में व्यवहारवाद को एक ठोस आधार प्रदान किया। मेरियम ने Chicago university को व्यवहारवादी राजनीति विज्ञान के अध्ययन केंद्र में बदल दिया, जो शिकागो संप्रदाय के नाम से विख्यात है। इसके बाद लॉसवेल, ट्रूमैन, साइमन आदि ने शिकागो संप्रदाय के कार्य को आगे बढ़ाया।

 रॉबर्ट ए. डहल के व्यवहारवादी विचार

 व्यवहारवाद का अर्थ अधिक स्पष्टता और व्यापकता के साथ राबर्ट ए.डहल ने स्पष्ट किया। इसके अनुसार -
* यह राजनीति विज्ञान के अंतर्गत एक ऐसा विरोध आंदोलन है, जिससे अनेक ऐसे राज वैज्ञानिक विशेषकर अमरीकी संबंध है जो परंपरागत राजनीति विज्ञान से असंतुष्ट हैं। यह परंपरागत राजनीति विज्ञान के विभिन्न उपागमों जैसे ; ऐतिहासिक, दार्शनिक, विवरणात्मक, संस्थात्मक आदि के विरुद्ध एक प्रतिक्रिया है।
* यह एक ऐसा आंदोलन है जिसका उद्देश्य राजनीति के अध्ययन को आधुनिक मनोविज्ञान, समाजशास्त्र और अर्थशास्त्र में विकसित सिद्धांतों, पद्धतियों, खोजों और दृष्टिकोणों के निकट संपर्क में लाना है।
* यह एक ऐसा परिवर्तन है जो राजनीति विज्ञान के आनुभविक तथ्यों को अधिक वैज्ञानिकता प्रदान करता है।
* इसका उद्देश्य प्रशासन संबंधी सभी घटनाओं को मनुष्य के एक ऐसे व्यवहार के रूप में प्रस्तुत करना है जिसका पर्यवेक्षण कर लिया गया हो अथवा जिसका पर्यवेक्षण किया जा सकता हो।
* व्यवहारवाद विषय के आनुभविक तत्वों को अधिक वैज्ञानिक बनाने का प्रयत्न है। यह ऐसा उपागम है जिसका उद्देश्य राजनीतिक जीवन के आनुभविक पक्ष को ऐसी प्रणालियों, सिद्धांतों और कसौटियों के द्वारा, जो आधुनिक आनुभविक विज्ञान के अभिसमयों, अधिनियमों और अभिग्रहों को पूरा करती हो, स्पष्ट करना है।
 संक्षेप में व्यवहारवाद एक ऐसा दृष्टिकोण है जिसका लक्ष्य विश्लेषण की नई इकाइयों, नई पद्धतियों, नई तकनीकों, नए तथ्यों और एक व्यवस्थित सिद्धांत के विकास को प्राप्त करना है। व्यवहारवाद की आधारभूत मान्यता यह है कि प्राकृतिक विज्ञान और समाज विज्ञानों के बीच एक गुणात्मक निरंतरता है।


 व्यवहारवाद (behaviorism) की विशेषताएं 

* राजनीतिक संस्था एवं संरचना के स्थान पर केंद्रित अध्ययन पर जोर।
* परिशुद्धता, पर्यवेक्षण, सत्यापन, परीक्षण, परिमाणन प्रमुख आधार है।
* राजनीति के अध्ययन शोध एवं विश्लेषण के लिए अनुभवात्मक और प्रकार्यात्मक दृष्टिकोण पर जोर देकर अध्ययन का केंद्र बिंदु राजनीतिक व्यवहार को ही मानता है। 
* यह मनुष्य के मनोभावात्मक, बोधात्मक तथा दृष्टिकोणात्मक तत्वों का अध्ययन करता है।
* व्यवहारवाद कोई निश्चित सिद्धांत नहीं है। यह एक मनोदशा व अनुनय है।
* व्यवहारवाद का उद्देश्य नई इकाइयों, नई पद्धतियों, नई तकनीकों के तथा एक व्यवस्थित सिद्धांत का विकास करना है।
* संस्थाओं एवं संस्थाओं के अध्ययन के बजाय उनमें काम करने वाले व्यक्तियों के व्यवहार का अध्ययन करता है।
* व्यवहारवादियों की अध्ययन शैली अन्तःविषयक है, इसलिए वे राजनीति को एक पृथक अथवा ज्ञान की विशिष्ट शाखा नहीं मानते हैं।
* राजनीति विज्ञान सामाजिक विज्ञान में से एक है और इसी कारण अन्य सामाजिक विज्ञानों से एकीकृत होना चाहिए।
* व्यवहारवाद ने राजनीतिक शास्त्रीयों को अंतर अनुशासनात्मक दृष्टिकोण प्रदान किया है।
* इसका संबंध क्या से है। अनुसंधान में तथ्यों को जानना अधिक महत्वपूर्ण है।
* वैज्ञानिक अनुभववाद के माध्यम से नई परविधियाँ एवं मापन के नए साधन विकसित किए हैं जिससे अध्ययन संगत तथा फलदायी सिद्ध हो रहे हैं।
* राजनीतिक जीवन के पक्षों का ही अध्ययन करता है।
* व्यवहारवाद राजनीतिक तत्वों की व्याख्या और विश्लेषण का एक विशेष तरीका है।
* व्यवहारवाद अनुभवात्मक और क्रियात्मक है तथा इसमें व्यक्ति निष्ठ मूल्यों और कल्पना के लिए कोई स्थान नहीं है।
डेविड ट्रूमैन :- "व्यवहारवाद का तात्पर्य दो विषयों से है - क्रमबद्ध अनुसंधान व अनुभवात्मक वैज्ञानिक पद्धतियों का प्रयोग है।"
आमडं व पावेल :- "राजनीति विज्ञान में अनुभववाद और यथार्थवाद के आधार पर जो अध्ययन किया जाता है, वही व्यवहारवादी अध्ययन है।"
स्ट्रांस :- "व्यवहारवादी अच्छाई के ज्ञान का तिरस्कार करता है और जीवन के प्रति शून्यवादी दृष्टिकोण को प्रोत्साहित करता है।"
अलफ्रेड कब्बन :-"व्यवहारवाद रातनीति के खतरनाक चक्कर से बचने के लिए विश्वविद्यालयों के शिक्षकों द्वारा अविष्कृत युक्ति है।"
क्रिक पैट्रिक :-"असंतोष से हलचल हुई और हलचल से परिवर्तन।"
डेविड ईस्टन ने भी अपनी पुस्तक Political System में स्वीकार किया है कि राजनीति विज्ञान उद्देश्यमूल्क और आदर्शपरक होनी चाहिए।
* व्यवहारिकता शब्द का प्रयोग सबसे पहले वाटसन ने किया।
जोसेफ उन्नर ने अपनी पुस्तक Dictionary of Political Science में व्यवहारवाद को परिभाषित करते हैं "व्यवहारवाद सामाजिक घटना का पूर्वाभिमुखीकरण है जो मुख्य रूप से अनुभववाद, तार्किक प्रत्यक्षवाद और अनुशासनिक स्वार्थो से संबंध है।"
व्यवहारवादियों का नारा था- * अस्पष्ट होना जितना बुरा था, गलत होना उतना नहीं।
* अप्रासंगिक सुनिश्चित से अस्पष्ट होना कम बुरा है।
• व्यवहारवाद द्वारा मूल्य निरपेक्ष अध्ययन के कारण व्यवहारवाद को अर्नाल्ड ब्रैस्ट ने 20 वीं सदी की 'दुखान्त घटना' तथा लियों स्ट्रांस ने इसे 'गटर की विजय' कहा।
रॉबर्ट ए. डहल ने व्यवहारवाद को एक विरोधी आंदोलन के रूप मे परिभाषित किया है।

• आनुभाविक उपागम (Empirical Approach) - 

आधुनिक यथार्थ पर आधारित एवं वैज्ञानिक है। व्यवहारवादियों द्वारा इसे आधुनिक उपागम कहा। इसमें राजनीतिक संस्थाओं का अध्ययन दिखने वाले व्यवहार के माध्यम से किया जाता है। यह क्या से संबंधित है। इस उपागम की मान्यता है कि अनुभव से परे ज्ञान का आधार नहीं होता है। समर्थक- रॉबर्ट ए. डहल, ट्रूमैन, ईस्टन, लॉसवेल। प्रयोगकर्ता - अरस्तू, बेंथम, मिल।
 नोट- आनुभाविक उपागम व्यवहारवादी कठोरता का शिकार है।

• प्रत्यक्षवादी सिद्धांत-  

वियना विश्वविद्यालय के मॉरीट्ज शिल्क के नेतृत्व में 1920 के दशक में  वियना सर्किल के रूप में विकसित हुआ। यह सिद्धांत व्यवहारवाद का प्रेरणा स्रोत है। चूँकि व्यवहारवाद वैज्ञानिक पद्धति पर बल देता है और वैज्ञानिक पद्धति प्रत्यक्षवाद पर आधारित है।
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