राज्य के नीति निदेशक तत्व : उद्देश्य एवं संवैधानिक प्रावधान

Directive principles of state policy in hindi,भाग 4, Article 36 से Article 51 तक। नीति निर्देशक तत्व के उद्देश्य, न्यायिक निर्णय।

• आयरलैंड के संविधान से अभिप्रेरित।
उद्देश्य-- सामाजिक और आर्थिक न्याय की प्राप्ति।
• ये देश की सरकार एवं सरकारी अभिकरणों के नाम जारी किए गए निर्देश हैं।
राज्य के नीति निदेशक तत्व Directive Principles of State.
Directive principles of state policy
डॉक्टर अंबेडकर (dr ambedkar) ने इनको संविधान की अनोखी विशेषता कहा है। 
• डॉ राजेंद्र प्रसाद (dr rajendra prasad) ने इसका मुख्य उद्देश्य जल कल्याण (welfare) वाली सामाजिक व्यवस्था का निर्माण करना बताया।
सर आइवर जेनिंग्स-- भारतीय संविधान का यह भाग फेबियन समाजवाद की स्थापना करता है।
ग्रेनविल ऑस्टिन ने इन्हें भारतीय संविधान की आत्मा कहा है।

नीति निर्देशक तत्वों के उद्देश्य

 सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय। जीवन स्तर को ऊंचा उठाना ; संसाधनों का समान वितरण ; अंतरराष्ट्रीय शांति को बढ़ावा देना।
डॉ. अम्बेडकर (dr ambedkar) :-- निर्देशक तत्वों का यह आशय नहीं है कि वह केवल पूजनीय घोषणाएं बनकर रह जाएं। ये अनुदेशो के दस्तावेज हैं, जो भी सत्ता में आएगा इनका आदर करना होगा।
• नीति निर्देशक तत्व वे लक्ष्य है जिन्हें हमें प्राप्त करना है और मूल अधिकार वे साधन हैं जिनके माध्यम से उन लक्ष्यों को प्राप्त किया जाना चाहिए।
• नीति निर्देशक तत्व आत्यंतिक हैं, क्योंकि उन पर किसी स्थिति में निर्बंध नहीं लगाया जा सकता है।
• वैधानिक शक्ति के अभाव एवं न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय नहीं होने के कारण आलोचना की जाती है। प्रो. के टी शाह ने "इसे एक ऐसा चेक कहा जिसका भुगतान बैंक की इच्छा पर छोड़ दिया जाता है।"
• श्री N R राघवाचारी :-- इन्हें ललित पदावली में व्यक्त उच्च ध्वनित भावनाओं की ऐसी पंक्तियां कहते हैं जिसका वैज्ञानिक दृष्टि से कोई महत्व नहीं है।
बी एन राव इन्हें नैतिक उपदेश मानते हैं।


नीति निर्देशक तत्व संवैधानिक प्रावधान 

• article 36 -- राज्य की परिभाषा दी गई है। राज्य के अंतर्गत - संघ सरकार, संसद, राज्य सरकार, विधानमंडल, संघ और राज्य के अधीन समस्त स्थानीय और अन्य प्राधिकारी।
• article 37 -- निदेशक तत्व न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय न होने पर भी देश के शासन के मूल आधार है और निश्चय ही विधि बनाने में इन सिद्धांतों को लागू करना राज्य का कर्तव्य होगा।
• article 38 -- राज्य लोक कल्याण की अभिवृद्धि के लिए सामाजिक व्यवस्था बनाएगा जिससे नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक न्याय मिलेगा।
• article 38 (2) -- 44th constitutional amendment 1978 द्वारा जोड़ा गया-- राज्य विशिष्टतया आय की असमानता को दूर करेगा।
• article 39 
article 39 (क) -- समान न्याय और नि:शुल्क विधिक सहायता, समान कार्य के लिए समान वेतन (equal pay for equal work) की व्यवस्था -- 42th constitutional amendment 1976 द्वारा जोड़ा गया।
article 39 (ख) -- सार्वजनिक धन का स्वामित्व तथा नियंत्रण सार्वजनिक हित में, जमीदारी पृथा समाप्त।

article 39 (ग) -- धन का समान वितरण।
article 39 (च) -- बच्चों को स्वतंत्र गरिमामय वातावरण, स्वस्थ विकास के लिए अवसर और सुविधा।
• article 40 -- ग्राम पंचायतों का संगठन।
• article 41-- कुछ दशाओं में काम, शिक्षा और लोक सहायता पाने का अधिकार।
• article 42 -- काम की न्यायसंगत और मनोवांछित दशाओं तथा प्रसूति सहायता पाने का अधिकार।
.• article 43 -- कर्मकारों के लिए निर्वाह मजदूरी, गांव में कुटीर उद्योग को प्रोत्साहन।
• article 43 क -- 42th constitutional amendment 1976 द्वारा जोड़ा गया-- उद्योगों के प्रबंधन में श्रमिकों की भागीदारी।
• article 44 -- नागरिकों के लिए समान सिविल संहिता (uniform civil code)।
• article 45 -- बालकों के लिए निशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का उपबंध - मूल संविधान में संविधान प्रारंभ के 10 वर्ष के भीतर 14 वर्ष तक के बच्चों को निशुल्क शिक्षा देगा।
वर्तमान में यह निदेशक सिद्धांत मूल अधिकार बन गया है और यह अनुच्छेद 45 रिक्त हो गया इसकी जगह नवीन अनुच्छेद है।
* नवीन अनुच्छेद 45 - 86th constitutional amendment  2002 द्वारा जोड़ा गया - राज्य 6 वर्ष की आयु के सभी बालकों को पूर्व बाल्यकाल की देखरेख और शिक्षा का अवसर देने के लिए उपबंध करेगा।
• article 46 -- अनुसूचित जातियों, जनजातियों एवं दुर्बल वर्गों की संरक्षा।
• article 47 -- पोषाहार स्तर, जीवन स्तर एवं लोक स्वास्थ्य के सुधार हेतु राज्य का कर्तव्य, मादक पदार्थों का प्रतिषेध।
• article 48 -- कृषि और पशुपालन का संगठन।
article 48 क -- पर्यावरण का संरक्षण, संवर्धन एवं वन्य जीवों की रक्षा।
• article 49 -- राष्ट्रीय महत्व के स्मारकों, स्थानों और वस्तुओं का संरक्षण।
• article 50 -- कार्यपालिका से न्यायपालिका का पृथक्करण।
• article 51 -- अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा की अभिवृद्धि।
• संविधान के अन्य भागों में उल्लेखित नीति निर्देशक तत्व, ये निर्देश न्यायालय के निर्णयाधिन नहीं है।  दलवी बनाम तमिलनाडु राज्य में निर्णय दिया कि संविधान के सभी भागों के साथ इन्हें भी पढ़ा जाना चाहिए --
article 350 क -- प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा में शिक्षा देना
article 351-- हिंदी को प्रोत्साहन देना
article 335 -- संघ/राज्य सेवाओं और पदों के लिए नियुक्त SC - ST के दावों का प्रशासन व दक्षता बनाए रखने की संगति के अनुसार ध्यान।
• article 31 ग --
* 25th constitutional amendment 1971 द्वारा जोड़ा गया
article 39 (ख) और (ग) में उल्लेखित नीति निर्देशक तत्वों को कार्यान्वित करने के लिए विधि बनाने की शक्ति देता है।
* इस प्रकार की बनाई गई विधि यदि article 14 एवं 19 के मूल अधिकारों का अतिक्रमण करती है तो वह विधि शून्य नहीं होगी। इस प्रकार नीति निर्देशक तत्वों को मूल अधिकार पर प्रभावी बनाया गया।
* केशवानंद भारती 1973 मामले में इसे महत्व दिया गया।
* 42th constitutional amendment द्वारा article 31 (ग) का विस्तार करके सभी नीति निर्देशक तत्वों को मौलिक अधिकारों पर प्राथमिकता दी गई।
* मिनर्वा मिल्स वाद 1980 में इस संशोधन को असंवैधानिक घोषित कर नीति निर्देशक और मूल अधिकारों को एक दूसरे के पूरक बताया। भाग 3 एवं 4 के बीच संतुलन भारतीय संविधान की आधारशिला है।
• सर्वप्रथम मद्रास राज्य बनाम चंपाकरण दोइराजन 1951 मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने मूल अधिकार (fundamental rights) और नीति निर्देशक तत्वों में विरोध की स्थिति में न्यायालय ने मौलिक अधिकारों को अधिमान किया तथा निदेशक तत्वों को मूल अधिकारों के सहायक के रूप में उल्लेखित किया।
सदानंद हेगड़े :-- सिद्धांतत: एक ही संविधान के दो भागों में कोई असंगति नहीं हो सकती।
ग्रेनविल ऑस्टिन :-- मूल अधिकारों और नीति निदेशक तत्वों को शामिल करने की अपेक्षा आशा थी कि भारत में वास्तविक स्वाधीनता का वृक्ष लहराएगा।
• ग्रेनविल ऑस्टिन ने - नीति निर्देशक तत्वों को आर्थिक स्वाधीनता की घोषणा कहा है।
• के सी व्हीयर ने - नीति निर्देशक तत्वों को उद्देश्य और आकांक्षाओं का घोषणा पत्र कहा है।
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