न्याय के सिद्धांत Theories of Justice

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उपयोगितावादी सिद्धांत Utilitarianism Theory - Bentham, j s mill


• इस सिद्धांत के अनुसार जो कुछ मानव जाति के सुख या उपयोगिता की अधिकतम वृद्धि में सहायक था वही न्याय है। उनका मानना था कि समस्त प्रतिबंधों की अनुपस्थिति में सुख समाहित है।
* सुखवाद (suicidal) -बेंथम (Bentham) -अधिकतम लोगो का अधिकतम सुख (Greatest Happiness of the Greatest Number).


Theories Of Justice
Theories of Justice


हकदारी सिद्धांत :- रॉबर्ट नॉजिक (robert nozick)


• अपनी कृति 'एनार्की स्टेट एंड यूटोपिया' (Anarchy State And Utopia) में इस सिद्धांत को लोकप्रिय बनाया। यह सिद्धांत नवउदारवादी (neoliberal) दृष्टिकोण का है। हकदारी सिद्धांत न्याय के तीन सिद्धान्तों पर आधारित है।

1. अंतरण का सिद्धांत
2. प्रारंभिक न्यायपूर्ण अर्जन का सिद्धांत
3. अन्याय - मार्जन का सिद्धान्त

• प्रत्येक व्यक्ति को संपत्ति के अधिकार का यह आधार है कि व्यक्ति को उसका हकदार होना चाहिए।

 जॉन रॉल्स का न्याय सिद्धांत john rowls theory of justice



* न्याय की अवधारणा औचित्य (justification) पर आधारित है। जॉन रॉल्स ने अपने सिद्धांत का प्रतिपादन ए थियरी ऑफ जस्टिस 'A theory of justice ' ने किया है। उसने उपयोगितावादियों का खंडन किया है और हेयक के उस विचार का खंडन किया है जो है जो हेयक ने समकालीन उदारवादी चिंतक होने के बावजूद भी प्रगति बनाम न्याय के विवाद में न्याय की अवहेलना करके प्रगति का पक्ष लिया है।

* रॉल्स अपनी चर्चा दो सिद्धांतों के आधार पर अधिक स्पष्ट करते हैं -

(१) प्रत्येक व्यक्ति को सर्वाधिक बुनियादी स्वतंत्रता का समान अधिकार होना चाहिए और यही अधिकार अन्य व्यक्तियों को भी प्राप्त होना चाहिए।

(२) सामाजिक तथा आर्थिक असमानताओं (social and economic inequality) को इस प्रकार क्रमबद्ध किया जाना चाहिए कि उन दोनों से न्यूनतम सुविधा प्राप्त लोगों को सर्वाधिक लाभ मिले और अवसर की निष्पक्ष समानता के आधार पर सभी को प्राप्त पद और दर्जे प्रभावित हो।

• अज्ञानता का आवरण/पर्दा The Cover of Ignorance

 न्याय के सिद्धांत (theory of Justice) अज्ञानता के पर्दे के पीछे चुने गए हैं। रॉल्स ने न्याय के नियमों का पता लगाने के लिए मनुष्य को एक काल्पनिक मूल स्थिति में रखा है जहां उन्हें सामाजिक-आर्थिक तथ्यों की जानकारी नहीं होती कि हम कौनसे परिवार में जन्म लेंगे तथा गरीब होगें या अमीर तथा आने वाले समय में अपने तथा परिवार के सदस्यों पर क्या प्रभाव पड़ेगा। वे इस बारे में अज्ञान के पर्दे के पीछे विचार करते हैं।

केसंवाद की कल्पना के कल्याणकारी राज्यों (Welfare States) के उदय के साथ उदारवादी परंपरा में न्याय की एक नई अभिधारणा की सबसे अच्छी व्याख्या रॉल्स की 'ए थ्योरी ऑफ़ जस्टिस' (A Theory of Justice) 1971 में हुई है। रॉल्स ने अपने सिद्धांत की रचना करने के लिए सामाजिक अनुबंध (social contract) और वितरणात्मक न्याय (distributive justice) की अवधारणा को आधार बनाते हैं और अपने न्याय सिद्धांत को प्रकार्यात्मक (functional) आधार प्रदान किया है।

वितरणात्मक न्याय Distributive Justice : अरस्तु Aristotle

 लाभों का वितरण न्यायपूर्ण (jurisdictional) और आवश्यक समायोजन। यह विचार तात्विक न्याय के निकट है और समाजवाद के साथ निकटता से जुड़ा है। ये आर्थिक जीवन में खुले स्पर्धा का विरोध करते हैं। यह न्याय समझौतावादी सिद्धांत पर आधारित है।

प्रक्रियात्मक न्याय :- समर्थक/प्रवर्तक-- हर्बर्ट स्पेंसर (spencer), हेयक (chetak), फ्रीडमैन (friedman), नॉजिक (robert nozick) हैं। परंतु जॉन रॉल्स ने प्रक्रियात्मक न्याय को सामाजिक न्याय के सिद्धांत (social justice theory) के साथ मिलाकर न्याय के व्यापक सिद्धांत की स्थापना का प्रयत्न किया है।
इस न्याय की धारणा उदारवाद के साथ निकट से जुड़ी है। प्रक्रियात्मक न्याय बाजार अर्थव्यवस्था (market economy) के नियमों को मानव व्यवहार का प्रमाण मानता है। ये इस बात को नहीं मानते की विशेष सहायता की जरूरतों वाले लोगों की ओर सरकार का ध्यान रहे। प्रक्रियात्मक न्याय का स्वरूप कानूनी/औपचारिकता से मिलता-जुलता है।

जॉन रॉल्स (john rowls) -- "न्याय की मूल भावना मनुष्यता के साथ प्रेम संबंधों का नैरंतर्य है।"

 "न्याय की सैद्धान्तिकी लापरवाही के पर्दे के पीछे गढ़ी जाती है।"

"यदि कानून कमजोर वर्गों के प्रति पक्षपात करते हैं तो वह न्यायोचित है।"

"अधिकार और न्याय का प्रयोग एक दूसरे के पर्याय के रूप में।"



न्याय का भेद सिद्धांत


रॉल्स के इस न्याय सिद्धांत का तात्पर्य है- आय और संपदा की असमानताएं उसी स्थिति में उचित मानी जा सकती है यदि वह न्यूनतम लाभान्वित के लिए अधिकतम लाभकारी हो।

समान लोगों के प्रति समान बरताव:--

• अमर्त्य सेन (amartya sen) की सामर्थ्य की समानता पर आधारित है। लोगों के बरताव वर्ग, जाति, नस्ल और लिंग के आधार पर नहीं परंतु उनके काम और क्रियाकलापों के आधार पर किया जाना चाहिए। अगर भिन्न जातियों के दो व्यक्ति एक ही काम करते हैं चाहे वह पत्थर तोड़ने का काम करता हो या पिज़्ज़ा बांटने का- उन्हें समान परिश्रम मिलना चाहिए।

समानुपातिक न्याय :-- लोगों को उनके प्रयास के पैमाने और अहर्ता के अनुपात में पुरस्कृत करना।

* किसी काम के लिए वांछित मेहनत, कौशल, संभावित खतरे आदि कारकों को ध्यान में रखते हुए अलग-अलग काम के लिए अलग-अलग पारिश्रमिक का निर्धारण उचित और न्याय संगत होगा।

* समाज में न्याय के लिए समान बरताव के सिद्धांत का समानुपातिक सिद्धांत के साथ संतुलन बिठाने की जरूरत है।

विशेष जरूरतों का विशेष ख्याल:-- पारिश्रमिक या कर्तव्यों का वितरण करते समय लोगों की विशेष जरूरतों का ख्याल रखने का सिद्धांत है। यह सामाजिक न्याय (social justice) को बढ़ावा देने का एक तरीका है। यह सामान बरताव के सिद्धांत का विस्तार करता है। सामाजिक रूप से पिछड़े वर्गों को विशेष सुविधा जैसे भारत में आरक्षण की व्यवस्था । विकलांग लोगों के लिए ढलान वाले मार्ग (रेंप) की व्यवस्था न्यायोचित है।

* नोट:-- उपरोक्त तीनों न्याय के सिद्धांतों के बीच सरकारें सामंजस्य बिठाने में कठिनाई महसूस कर सकती है। समान बरताव के सिद्धांत पर अमल से कभी-कभी योग्यता को उचित प्रतिफल देने के खिलाफ खड़ा हो सकता है। योग्यता को पुरस्कृत करने के न्याय के प्रमुख सिद्धांत मानने का अर्थ होगा हाशिए पर खड़े तबके कई क्षेत्रों में वंचित रह जाएंगे। अतः सरकार की जिम्मेदारी बन जाती है कि वह एक न्यायपरक समाज को बढ़ावा देने के लिए न्याय के विभिन्न सिद्धांतों के बीच सामंजस्य स्थापित करें।

न्यायपूर्ण बंटवारा:-- सामाजिक न्याय का सरोकार वस्तुओं और सेवाओं के न्यायोचित वितरण से है, चाहे वह राष्ट्रों के बीच वितरण का मामला हो या किसी समाज के अंदर विभिन्न समूहों और व्यक्तियों के बीच का। गंभीर सामाजिक या आर्थिक असमानता हो तो समाज के कुछ प्रमुख संसाधनों का पुनर्वितरण हो।

राजनीतिक न्याय political justice:-- समाज के पीड़ित, शोषित एवं उपेक्षित वर्गों को उनके विकास के लिए राजनीतिक शैक्षणिक, आर्थिक एवं सेवाओं के क्षेत्र में कुछ विशेष सुविधाएं विशेष अवधि के लिए विधान मंडल द्वारा नियम बनाकर जैसे भारत में SC, ST, OBC को दी गई सुविधाएं राजनीतिक न्याय के अंतर्गत आती है।

डेविड मिलर (david Miller) ने अपनी पुस्तक 'सोशल जस्टिस' (social justice) के अंतर्गत तीन ऐसी कसौटियों का उल्लेख किया है जिनके आधार पर विभिन्न विचारक न्याय की समस्या का समाधान ढूंढते हैं।

1. स्वीकृत अधिकारों का संरक्षण- प्रवर्तक- डेविड ह्यूम, श्रेणीतंत्रीय व्यवस्था को जन्म देता है।

2. योग्यता के अनुरूप वितरण:-- प्रवर्तक- हरबर्ट स्पेंसर, खुले बाजार की व्यवस्था का पोषक है।

3. आवश्यकता के अनुरूप वितरण:-- प्रवर्तक- पीटर क्रॉपॉटकिन, समैक्यवादी समाज को बढ़ावा देता है।

न्याय का निवारक सिद्धांत Prevetive Theory of Justice

कठोर एवं चेतावनी युक्त सजा देना ताकि जुर्म को रोका जा सके।

प्रतिकारी न्याय का सिद्धांत reciprocating justice theory :-- प्रतिशोध सिद्धांत पर आधारित है।

प्राकृतिक न्याय का सिद्धांत Theory of Natural Justice

पहले स्टोइक और बाद में रोमन विधिशास्त्रियों द्वारा विकसित किया गया। यह सिद्धांत भी नैतिकता या औचित्य की भावना से ओतप्रोत है।

वैधानिक सिद्धांत:-- समर्थक- हॉब्स, बेन्थम, ऑस्टिन, तथा डायसी। यह सिद्धांत न्याय के सभी सिद्धांतों में सर्वाधिक स्पष्ट और प्रचलित है।

प्लेटो के समय में न्याय संबंधी सिद्धांत Plato's times Theory of Justice

प्लेटो ने जो न्याय की तस्वीर खींची है वह परंपरागत दृष्टिकोण का उपयुक्त उदाहरण है। प्लेटो ने न्याय की स्थापना के उद्देश्य से नागरिक के कर्तव्य पर बल दिया है। न्यायपूर्ण व्यवस्था की स्थापना के लिए उसने नागरिकों के 3 वर्ग बनाएं - 1.दर्शनिक शासक 2. सैनिक वर्ग और 3.उत्पादक वर्ग। उसने यह तर्क दिया कि जब यह तीनों वर्ग निष्ठापूर्वक अपने अपने कर्तव्यों का पालन करेंगे तब राज्य की व्यवस्था अपने आप न्यायपूर्ण होगी।
1. परंपरावादी-- सेफालस (cephalus) :- न्याय सत्य बोलने तथा कर्ज चुकाने में निहित है।

2. उग्रवादी:--थ्रेसिमेकस:- शक्तिशाली का हित ही न्याय है।

3. यथार्थवादी (realistic) :-- ग्ल्यूकोन:- न्याय का भय शिशु है।कमजोर की आवश्यकता है।
न्याय के सिद्धांत Theories of Justice  न्याय के सिद्धांत Theories of Justice Reviewed by Mahender Kumar on फ़रवरी 25, 2018 Rating: 5

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