न्याय का अर्थ एवं परिभाषा concept of Justice

न्याय की अवधारणा Concept of justice : justice meaning ; justice definition ; न्याय justice क्या है?  


न्याय का अर्थ Justice Meaning

• Justia(लैटिन)- जोड़ना/सम्मिलित करना।

• प्राचीन यूनानी चिंतन में न्याय की नैतिक दृष्टि से विवेचना।

आधुनिक चिंतन में न्याय की कानूनी दृष्टि से विवेचना।

• न्याय में व्यक्ति का विकास (person development) तथा सामाजिक कल्याण (social welfare) दोनों विचार निहित है।

• दार्शनिक संकल्पना में सामाजिक न्याय (social justice) एक समतावादी समाज की स्थापना का उद्देश्य लेकर चलता है।

• न्याय किसी प्रकार का भेदभाव नहीं हो सकता।

न्याय दुर्बल का हित नहीं है।

• सामाजिक न्याय (social justice) बंधुता के आदर्श को साकार करना चाहता है।

• कानूनी न्याय (legal justice)- औपचारिक न्याय।

• तात्विक न्याय - कानून का सार तत्व।

• राजनीतिक न्याय (political justice)- स्वतंत्रता के आदर्श को प्रमुखता।

• आर्थिक न्याय (Economy justice)- समानता के आदर्श को महत्व।

• न्याय का व्यापक दर्शन- राजनीतिक सामाजिक और आर्थिक न्याय।

• न्याय के परंपरागत दृष्टिकोण का मुख्य सरोकार व्यक्ति के चरित्र से था।



• आधुनिक दृष्टिकोण का मुख्य सरोकार सामाजिक न्याय (social justice) से है।


• मनु और कौटिल्य के न्याय संबंधी विचारों को पश्चिम के राजनीतिक चिंतक आधुनिक युग मैं ही अपना सके।

• व्यक्ति की स्वतंत्रता एवं उसके अधिकारों की रक्षा।

• व्यक्तिगत एवं सामाजिक हित में सामंजस्य।

• सभी व्यक्तियों के साथ समानता का व्यवहार।

• किसी विशेष कारण के बिना न्याय पूर्ण व्यवहार से किसी को वंचित न किया जाना।

• परंपरागत धारणा कानूनी और राजनीतिक,राजनीतिक न्याय ही था। आर्थिक न्याय के लिए कोई स्थान नहीं था परंतु आधुनिक धारणा में आर्थिक न्याय पर भी बल दिया जाता है।

• न्याय संभाव्यता सिद्धांत के आधार पर कार्य करता है।

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Concept of Justice

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न्याय की परिभाषा justice definition


डेविड ह्यूम- "न्याय के उदय का एकमात्र आधार सार्वजनिक उपयोगिता है।"
 "कानून का पालन ही न्याय है।"

• ऑगस्टाइन (Augustine) - "जिन राज्यों में न्याय नहीं रह जाता, वे डाकुओं के झुंड मात्र कह सकते हैं।"

• अरस्तु (Aristotle) - "न्याय का सरोकार मानवीय संबंधों के नियमन से है।"

• ऑगस्टाइन (Augustine) - "न्याय को ईश्वरीय राज्य का प्रमुख तत्व माना है।"

• बार्कर (Barker) - "न्याय को अंतिम मूल्य कहा है।"

• अरस्तु (aristotle) -"न्याय वह सद्गुण है जो हम एक दूसरे के साथ व्यवहार में प्रदर्शित करते हैं।"

• मध्ययुग में न्याय सद्गुण के रूप में।

• प्लेटो (plato) -"आत्मा के तत्वों के अनुरूप कर्तव्यों के निर्धारण को न्याय का आधार माना है।"
"न्याय निरपेक्ष (absolute) अवधारणा है।"

•डी. डी. रैफल-" न्याय द्विमुखी है।"

• प्लेटो (plato) ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ 'रिपब्लिक' (Republic) में न्याय सिद्धांत का प्रतिपादन एक नैतिक सिद्धांत (ethical theory) के रूप में किया है। उसने न्याय शब्द का प्रयोग धर्म (लौकिक धर्म) के अर्थ में किया है।


अरस्तु (Aristotle) के अनुसार न्याय के दो भेद हैं 

वितरणात्मक अथवा राजनीतिक न्याय


 राजनीतिक पदों पर नियुक्ति नागरिकों की योग्यता तथा उनके द्वारा राज्य के प्रति की गई सेवा के अनुसार।

सुधारक न्याय (corrective justice)

 नागरिक-नागरिकों के मध्य सुव्यवस्थित रुप से सामाजिक जीवन कायम करना।

अरस्तु (Aristotle) वितरणात्मक न्याय (distributive justice) का अग्रज प्रतिपादक था।
अरस्तु का न्याय सिद्धांत कानून पर आधारित है।

• प्राचीन यूनानी दार्शनिक प्लेटो के चिंतन का मुख्य आधार न्याय की संकल्पना थी। उसने जो न्याय की तस्वीर खींची वह परंपरागत दृष्टिकोण का उपयुक्त उदाहरण है।
 न्याय की स्थापना के उद्देश्य में नागरिकों के कर्तव्य पर बल
न्याय पूर्ण व्यवस्था हेतु नागरिकों के तीन वर्ग बनाए-

1. दार्शनिक शासक 2. सैनिक वर्ग 3. उत्पादक वर्ग।

प्लेटो (plato) ने अपने न्याय सिद्धांत में दार्शनिक वर्ग के शासन का समर्थन किया। 

• समाजवादियों (socialist) ने न्याय की आर्थिक अवधारणा पर अधिक जोर दिया।

• पाश्चात्य राजनीतिक चिंतन में न्याय की व्याख्या सर्वप्रथम प्लेटो ने की।

• मिल के अनुसार न्याय सामाजिक उपयोगिता का सबसे महत्वपूर्ण तत्व है।

• न्याय के अर्थ का निर्णय करने का प्रयत्न सबसे पहले यूनानियों और रोमनों ने किया। यूनानी दार्शनिक प्लेटो ने न्याय को परिभाषित करते हुए उसे सद्गुण कहा, जिसके साथ संयम, बुद्धिमानी और साहस का संयोग होना चाहिए। उनके शिष्य अरस्तु ने न्याय के अर्थ में संशोधन करते हुए कहा कि न्याय का अभिप्राय आवश्यक रूप से एक खास स्तर की समानता है। यह समानता (1) व्यवहार की समानता तथा (2) आनुपातिकता या तुल्यता पर आधारित हो सकती है। उन्होंने आगे कहा कि व्यवहार की समानता से ‘योग्यतानुसारी न्याय’ उत्पन्न होता है और आनुपातिकता से ‘वितरणात्मक न्याय’ (distributive justice) प्रतिफलित होता है। इसमें न्यायालयों तथा न्यायाधीशों का काम योग्यतानुसार न्याय का वितरण होता है और विधायिका का काम वितरणात्मक न्याय का वितरण होता है। दो व्यक्तियों के बीच के कानूनी विवादों में दण्ड की व्यवस्था योग्यतानुसारी न्याय के सिद्धांतों के अनुसार होना चाहिए, जिसमें न्यायपालिका को समानता के मध्यवर्ती बिंदु पर पहुँचने का प्रयत्न करना चाहिए और राजनीतिक अधिकारों, सम्मान, संपत्ति तथा वस्तुओं के आवंटन में वितरणात्मक न्याय के सिद्धांतों पर चलना चाहिए। इसके साथ ही किसी भी समाज में वितरणात्मक और योग्यतानुसारी न्याय के बीच तालमेल बैठाना आवश्यक है। फलतः अरस्तू ने किसी भी समाज में न्याय की अवधारणा को एक परिवर्तनधर्मी संतुलन के रूप में देखा, जो सदा एक ही स्थिति में नहीं रह सकती।

रोमनों तथा स्टोइकों ने न्याय की एक किंचित् भिन्न कल्पना विकसित की। उनका मानना था कि न्याय कानूनों और प्रथाओं से निसृत नहीं होता बल्कि उसे तर्क-बुद्धि से ही प्राप्त किया जा सकता है।

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न्याय का अर्थ एवं परिभाषा concept of Justice  न्याय का अर्थ एवं परिभाषा concept of Justice Reviewed by Mahender Kumar on फ़रवरी 24, 2018 Rating: 5

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